Monday, 1 June 2020

मौलिक अधिकारों के हनन पर मूकदर्शक बना न्यायालय


कृपया youtube वीडियो  "अपना अपना सोच" पर भी मेरे विचार जाने | यह पत्र सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Grievance Management 19403 /SCI/PIL (E)/2020 में रजिस्टर्ड |
 
माननीय मुख्य न्यायाधीश                                                                                         दिनांक : 14-05-2020
सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली
विषय: मौलिक अधिकारों के हनन पर मूकदर्शक बना न्यायालय
महोदय,
मैं आपको याद दिलाना चाहूंगा कि ना जाने कितने फैसले आपने दिए हैं और ना जाने कितने कानून बने हुए हैं भारतीय नागरिकों के मौलिक अधिकारों के समबन्ध में परन्तु क्या उनका पालन हो रहा है ? क्या यह न्यायालय की अवमानना का मामला नहीं है ? इसके लिए किसको सज़ा मिलनी चाहिए आम आदमी को पता ही नहीं है | सरकार और प्रशासन को क्यों आरोपित करें जबकि न्यायालय तो इस पंक्ति में सबसे आगे खड़ा है | हमारे एक केस 39940 वर्ष 2018 में सर्वोच्च न्यायालय के जजों ने हमारे मौलिक अधिकार का हनन किया और अब तक अनेकों पत्रों का पिछले 9 माह में कोई संज्ञान नहीं लिया | शाहीन बाग़ केस में भी आपने दिल्ली के लोगों का मौलिक अधिकार का जानबूझकर हनन किया | यहाँ मैं कुछ मुद्दे आपको याद दिलाना चाहूंगा जिन पर मैं स्वयं अनेकों बार क्या लगभग रोज़ परेशानी महसूस करता हूँ |
1- दिनभर धार्मिक और गैरधार्मिक स्थानों से चिल्लाते लाउड स्पीकर | किसलिए घरों, अस्पताल, स्कूलों या कमर्शियल जगहों पर एक मिनट के लिए भी लाउड स्पीकर बजे?  इसका उपयोग क्यों नहीं सिर्फ आपातकाल और पुलिस के लिए हो? विशेष अवसरों अथवा इक्का दुक्का त्योहारों पर रिमोट क्षेत्र में इसकी बिना भेदभाव और तुष्टिकरण के क्यों ना पूर्व अनुमति हो ?
2- राजनैतिक, धार्मिक व गैरराजनैतिक, गैरधार्मिक जुलूस और रैलियां आये दिन आम आदमी के मौलिक अधिकारों का हनन कर रहीं हैं | क्या आम आदमी बिना राजनैतिक, धार्मिक व गैरराजनैतिक, गैरधार्मिक जुलूस और रैलियों में शामिल हुए बगैर और अपनी सुख शांति को कायम रखते हुए अपने राष्ट्र और इष्ट देव के प्रति अपनी निष्ठा और आस्था नहीं रख सकता? क्या किसी नागरिक को अपनी निष्ठा और आस्था सिद्ध करने के लिए दूसरों के इस मौलिक अधिकार के हनन करने का अधिकार है?
3- रेल की पटरियों, सड़कों पर रेल और रास्ता रोकना आम है | हफ़्तों और महीनों न सिर्फ शासन और प्रशासन बल्कि न्यायालय ने पिछले दशकों में जानबूझकर चलने दिया | उससे हुई परेशानियाँ और नुकसान आज भी मैं भूला नहीं हूँ | क्या किसी एक नागरिक का मौलिक अधिकार दूसरे के मौलिक अधिकार से अधिक है? इन कार्यों के लिए तो पहले ही दिशा निर्देश हैं तो फिर क्या नए दिशा निर्देशों की आवश्यकता है या फिर राजनैतिज्ञों, अधिकारियों और प्रदर्शन करने वाले अपराधियों को सजा की  ?
4- सड़कों, गलियों, आवासीय व गैर आवासीय स्थानों पर दुकानों और रेड़ियों आदि द्वारा किया जा रहा अतिक्रमण | न सिर्फ भरेपूरे लोगों द्वारा बल्कि गरीब और मैकेनिक आदि के नाम पर इस अतिक्रमण को बढ़ावा दिया जाता है | आधी चौथाई सड़क मेकैनिक और पटरी वालों के नाम पर अतिक्रमित कर ली जाती हैं और आधी चौथाई ऑटो वाहन द्वारा | म्युनिस्पैलिटी भी निजी हितों के लिए पार्किंग के नाम पर नागरिकों के मौलिक अधिकारों का हनन करती हैं | प्रशासन को लिखे पत्र बेकार ही साबित होते रहे हैं |
5- अत्यंत तेज़ इंजन आवाज़ वाली बहुत तेज़ स्पीड से कॉलोनियों और सड़कों पर हॉर्न बजाती मोटरसाइकिलें क्या दूसरे नागरिकों के लिए परेशानी और असुरक्षा पैदा कर उनके मौलिक अधिकारों का हनन नहीं कर रही हैं? वाहनों के लिए आवाज़ और स्पीड के नियम तो शायद पहले ही परिभाषित हैं | प्रशासन को कुछ भी लिखना बहरे के आगे बीन बजाना हैं |
6- विश्व का सबसे असुक्षित वाहन ट्रेक्टर ट्राली जो किसी भी दृष्टि से टेकनीकल नॉर्म्स पूरा नहीं करता बिना रेजिस्ट्रेशन अथवा रेजिस्ट्रेशन के साथ किसान और मजदूरों को सुविधा के नाम पर शासन और प्रशासन के आशीर्वाद से चलाया जा रहा है | शायद यह दुर्घटनाओं का सबसे बड़ा कारण भी हैं | क्या यह आम नागरिक के सुरक्षा के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं है?
7- 1990 की निर्मम हत्याओं, बलात्कार के बाद अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह जीवन बिताने पर न्यायालय को मौलिक अधिकार का हनन नहीं दिखाई देता |
भवदीय,

सुबोध कुमार अग्रवाल                                                                     
  307 पुरानी आवास विकास कॉलोनी
  सिविल लाइन्स रामपुर उ. प्र. 244901
  मोबाइल: 9837100538         
 प्रतिलिपि:             1- माननीय उपराष्ट्रपति                                  2- माननीय प्रधान मंत्री
                3- माननीय गृह मंत्री                                    4- माननीय कानून और न्याय मंत्री
                5- माननीय मुख्य मंत्री उत्तर प्रदेश

No comments:

Post a Comment