हमारे अस्पतालों में क्या आपको उपभोक्ता सूची दिखाई देती है
यानि अलग अलग इलाज के खर्चे का विवरण, रूम charges आदि जबकि सब कुछ उनके पास फाइलों
में मोजूद है | यदि आपका मेडिकल insurance है तो वह estimate बनाकर TPA को भेजते
हैं जो वास्तविक से बहुत ज़्यादा होता है | आपको बाद में पता चलता है कि आप Rs 2000/-
प्रतिदिन बेड के entitle हैं और estimate Rs 3000/- प्रतिदिन के बेड का बना है अतः
आपके पूरे बिल को prorata basis पर पास किया गया है | आपको Rs 3000/- का कमरा दिया
गया है | ना तो डॉक्टर और ना ही TPA आपको पहले बताता है | prorata क्यों है इसका
जवाब होता है कि ज्यादा पैसे के रूम पर doctor visit, laboratory investigation, opreation
theater के charges भी उसी ratio में होते हैं जबकि वही doctor, laboratory, opreation
theater होता है और कोई भी extra facility महंगे रूम लेने पर या सस्ते रूम पर कम provide
नहीं की जाती | रूम facility से doctor, laboratory, opreation theater का कोई
लेना देना नही होता | मरीज के अभिवावक doctor से ज्यादा बहस इस मुद्दे पर कहीं कर
पाते और अस्पताल की कोशिश होती है कि आपको ज्यादा से ज्यादा अँधेरे में रखे | फाइनल
बिल दोपहर के बाद ही भेजा जाता है चाहे डॉक्टर सुबह 9 बजे आपको डिस्चार्ज के लिए
कह दे | यह बिल आधी रात या सुबह आधा अधूरा पास होगा ताकि आप को वहां एक रात और
रुकना पड़े | TPA और अस्पताल आपके entitlement के बारे में इलाज से पहले सूचना नहीं
देंते हैं | यदि आप बगैर insurance के इलाज कराएँगे तो वह इससे आधे में उसी
अस्पताल और उसी सुविधा में होगा, यानि सारी कटोती के बाद insurance प्रीमियम भरकर भी
आप 10-15% ही बचा पाते हो और अस्पताल चांदी काट रहे हैं और सरकार चुपचाप इस खेल को
देख रही है | आपके insurance प्रीमियम का ज़्यादातर फायदा अस्पतालों को मिल रहा है
| TPA और insurance कंपनी ऐसा खेल क्यों कर करा रहीं हैं कहना मुश्किल है | एक बार
कैश pay करने के बाद आप सालों साल अपने ज़िम में एक परेशानी TPA के साथ follow up
की पाल लेते हो और यह अदालत तक आप को ले जाती है | मेरे अपने भाइयों के परिवार के
ऐसे तीन केस हैं और मै अपनी जिद के कारण इनको छोड़ नहीं रहा हूँ | Insurance
company RTI में उलटे सीधे जवाब देकर छुटकारा पाना चाहतीं हैं |
Saturday, 28 July 2018
Monday, 23 July 2018
Kaizan in Railways
Railways may have to think fresh and come up with new ideas to match with
airlines. I have few vague ideas which can be converted to practical
requirement of floor.
1-
Employ young boys and girls well uniformed ready to do
cleaning of toilet and compartment as a prime job, providing bed roll. Their
secondary job would be to check tickets, a few minutes job in a single journey.
They are suppose to check curtains & sofa including mechanical, electrical
and electronics devices properly working and get them corrected if not possible
by them. May please start it in Duranto and Rajdhani trains in which most of
the time attendants and TCs are sleeping. Shift all old such guys to other
trains as they won’t like to do it.
2-
In 15 hrs flight Mumbai to New York being vacuum toilets cleaning
is not required otherwise meals serving, collection of used plates and waste
including providing you pillow and blanket, guide to seat, assisting to keep
luggage etc being done by qualified and so called middle class boys and girls
at their sweet will.
3-
You may be worried for wage bill but I am sure it will
reduce as productivity and business would increase. You have to remove or shift
non-efficient staff to local trains and non A.C. compartments.
4-
I am surprise to note that Trivendram Nizamuddin exp.
12431 of dated 17th July had occupancy of 15-25% through out with 50
% dynamic fare, showing full occupancy on booking portal. I travelled alone throughout
in II A.C. with rest 5 berths unoccupied from Udupi to Nizamuddin boarding on
18th July.
I would come up with few suggestions without
spending much and providing facilities in A.C. for better comforts in my next
blog.
Wednesday, 4 July 2018
न्यायायिक व्यवस्था में सुधार बिना भारत की समस्याओं का समाधान नहीं
भारत के इतिहास में झांके तो पायेंगें पहले राजा न्याय करता
था | राजा की प्रतिष्ठा की समीक्षा में न्याय व्यवस्था का मुख्य स्थान होता था |
राजा कैसा न्याय करता था उसकी प्रतिक्रियायें इतिहास में दर्ज हैं | राजा राम हों
या जहांगीर | आज न्याय प्रक्रिया भारत के राजा यानि प्रधान मंत्री के पास नहीं है
लेकिन न्यायायिक प्रक्रिया पर प्रहार का शिकार वही बनता है | न्यायालय की कोई जवाब देही नहीं
और वह साफ़ बाहर निकल आता है | शिथिल न्यायायिक प्रक्रिया और निर्णयों का न्यायालय
की साख और न्यायाधीश के करियर पर कोई फर्क नहीं पड़ता | न्यायालय ना तो राजा के
प्रति और नाही प्रजा प्रति जवाब देह है | वह तो उस ब्रिटिश राजा और अब महारानी की
तरह है जो कभी कोई गलती कर ही नहीं सकता | यही भारत की समस्याओं की जड़ है | न्यायालय
में सुधार के लिए कोई तैयार नहीं | जजों की नियुक्ति हमेशा ही सवाल बना हुआ है | लाखों
केस पेंडिंग हैं क्योंकि न्यायालय में 4-5 घंटे प्रतिदिन, सप्ताह में 5 दिन और साल
में 200 दिन से ज्यादा काम नहीं हो पाता | वकीलों को तारीखों पर तारीखें दी जाती
हैं | यदि जजों को ज़्यादा होम वर्क करना पड़ता है तो फिर क्यों नहीं सुबह 9 से
दोपहर डेढ़ बजे तक जजों की एक शिफ्ट काम करे और डेढ़ से 6 बजे तक दूसरी | 5 दिन की
जगह साढ़े तीन दिन जजों का एक सेट बाकि साढ़े तीन दिन जजों का दूसरा सेट काम करे |
त्योहारों और दूसरी छुट्टी जिसको लेनी हो लें लेकिन उनके स्थान पर दूसरे जज काम
करें | जज, वकील और उपभोक्ता गिने चुने दिन छोड़कर अपने लिए तारीखों का चुनाव करें
| 5-6 गुना काम हो सकता है | अलग से कोर्ट के इन्फ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरी नहीं | क्लर्क
की नौकरी के लिये तो लोग मारे मारे फिर रहे हैं | क्या जज बनने के लिए भी हमारे पास
काबिल लोग नहीं ?
तुरत न्याय ही अपराध रोकने और समय बचाने का तरीका है जो देश
के विकास की मुख्य आवश्यकता है | जनसंख्या को अभिशाप नहीं वरदान माने |
Sunday, 1 July 2018
शिक्षा संस्थानों में राजनीति
शशि शेखर जी के लेख नियमित ही पढ़ता हूँ, अच्छे होते हैं |
आज भी हिन्दुस्तान दिनांक 1-7-2018 में ‘ शिक्षा मन्दिरों में सियासी कालिख ‘
शीर्षक वाला लेख पढ़ा | शीर्षक बहुत आकर्षक लगा लेकिन क्षमा करें, आप समस्या की जड़
तक नहीं पहुंचे | असल समस्या तो हमारे न्यायालय है जिसने कुछ वर्ष पूर्व दोबारा
शिक्षा संस्थानों में चुनावों को लागू करा दिया | न्यायालय जब चाहते हैं बॉस बन
जाते हैं जब चाहे पीछा छुड़ा लेते हैं | क्या हमारे यहाँ इतिहास में शिक्षा
संस्थानों में राजनीति का स्थान था ? मैं अचरज करता हूँ जब 1970 के दशक में रुड़की
विश्वविदयालय में मैं इंजीनियरिंग का छात्र था और मैस व विश्वविद्यालय की अलग अलग
इकाइयों के लिए चुनाव होते थे, ज़्यादातर छात्र वोट देने के अलावा इस प्रक्रिया से
अलग रहते थे, अपनी पढाई व खेल कूद और दूसरी extra curicular activities में व्यस्त
रहते थे | लेकिन क्या वास्तव में चुनाव की आवश्यकता थी ? यदि मैस के या अन्य
इकाइयों के संचालन में छात्रों की भागीदारी करानी ही हो तो अन्य साधारण तरीके अपनाए
जा सकते हैं जैसे लाटरी अथवा सबसे ज्यादा अंक पाने वाला या सबसे कम अंक पाने वाला छात्र
| दिल्ली विश्वविदयालय और JNU से लेकर पूरे भारत में नेताओं ने अपने लिए शिक्षा
संस्थानों को उद्योग बना दिया है जहाँ विधान सभा और लोक सभा चुनावों की तरह
भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी व्याप्त है और भविष्य के लिए नेता तैयार किये जाते हैं |
आप पायेंगें कि समूचे देश में शिक्षा संस्थाओं में राजनीति और चुनाव ही समस्याओं
कि जड़ है | आप पढने आये हैं, पढाई और राजनीति का घालमेल नहीं हो सकता | वैसे भी
भारत जैसे देश में जहाँ आम आदमी को रोज़ी रोटी, सुरक्षा और न्याय न मिलता हो वहां
दूसरे वर्ग को ज़रुरत से ज़्यादा मान्यता और तरजीह, अनावश्यक महत्वाकांक्षायें ही
पैदा करेंगीं | आप मेरा ब्लॉग ‘ क्या भारत में किसी को हड़ताल का अधिकार ‘ व ‘ कार्य
के प्रति ईमानदारी ‘ भी पढ़ें |
वैसे भी देश की तमाम समस्याओं की जड़ में न्यायालय की
दादागीरि और प्रक्रिया ज़िम्मेदार है और उसकी सही व गलत की व्याख्या करने की हिम्मत
ना जुटाने के लिए मीडिया ज़िम्मेदार, वरना क्या हिम्मत कोई नेता, राजनेता, अफसर
मनमानी और भ्रष्टाचार कर सके | चोरी और बलात्कार कि घटनाएं घटकर 2-4 प्रतिशत रह
जाएँ यदि तुरत न्याय मिले | सप्ताह में 5 दिन, साल में 200 दिन, 4-6 घंटे प्रतिदिन
काम करने वाले, अपनी मर्जी से संविधान विरुध्द कोलेजियम से अपनी नियुक्ति करने वाले
न्यायालयों से न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?
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