Wednesday, 12 August 2020

हिन्दू परम्पराओं को जाने अनजाने तोड़ने की कोशिश

 स्त्रियों के संबंध में समाज, सरकारें, न्यायालय कुछ विकृत मानसिकता वाले लोगों की सोच पर ही चल रही हैं जिसका कारण जाने अनजाने हिन्दू संस्कृति और परंपराओं पर आघात करना है। कल सुप्रीम कोर्ट के फैसले में जस्टिस अरुण मिश्रा की टिप्पणी बहुत ही पीढ़ा दायक है कि बेटे शादी तक ही माता पिता से जुड़े होते हैं और बेटियां हमेशा। यह शायद उनके स्वयं के ऊपर लागू होता हो वरना मुझे अपने आसपास कोई माता पिता दिखाई नहीं देते जिनके पुत्र उनकी सेवा में अंत तक ना जुड़े हो। अपवाद पुत्र क्या पुत्रियों में भी मिलेंगे। यह संपत्ति बटवारे के सिलसिले में दिया गया उनका बयान है। मैं अनेकों गरीब लोगों की कहानियां और फोटो देखता हूं जिसमें अक्षम व्यक्ति भी अपने मां बाप की सेवा के लिए समर्पित है । जहां तक संपत्ति बट वारे की बात है क्या फर्क पड़ता है यदि बेटी को शामिल कर लो, बहू भी तो फिर किसी की बेटी के नाते संपत्ति लेकर आएगी। हिन्दू परंपराओं को तोड़ने का लाभ क्या है? मै आज तक समझ नहीं पाया कि एक बेटी बहू बनकर क्यों अपना धर्म नहीं निभा पाती। उसके वह सारे गुण कहां खो जाते हैं जिनकी वकालत की जाती है।