Thursday, 25 January 2018

माननीय, हुज़ूर और my lord, my honour संबोधन का अर्थ ?




किसी भी निर्वाचित सदस्य के लिए माननीय का संबोधन क्यों होता है ? क्या हम एक मजदूर और निर्वाचित सदस्य में फर्क करते है ? तो फिर मजदूर को माननीय मजदूर क्यों नहीं कहा जाता | एक तरफ हम मानते हैं कि निर्वाचित सदस्य या प्रशासनिक अधिकारी जनता का सेवक है और प्रधान मंत्री प्रधान सेवक, जनता मालिक | तो फिर क्यों जनता यानि मालिक अपने नौकर यानि सेवक के लिए माननीय संबोधन का इस्तेमाल करती है ?
इस पर विचार किया जाना चाहिये कि न्यायालय में हुज़ूर, my lord, my honour आदि संबोधन क्या उचित हैं ? क्यों नहीं अदालत में हम ‘ महोदय ‘ का संबोधन कर सकते ? जज, यानि वह व्यक्ति जो उस समय कुर्सी में आसीन है | हुज़ूर, my lord, my honour व्यक्ति विशेष जो भगवान् के समकक्ष है | यह संबोधन और भी चुनौती पूर्ण हो जाता है जब न्यायालय की उस कुर्सी से न्याय का इन्तज़ार करते करते व्यक्ति दुनिया से चला जाता है | उस जज को मै अंतर्मन से हुज़ूर कैसे कहूं जो तारीखों पर तारीखें दे रहा है और उसके बगल में बैठा व्यक्ति तारीख के लिए घूस ले रहा है और जज सुबह 11 बजे बुला कर शाम चार बजे तक इन्तजार कराता है, वह 1 मिनट की भी बात सुनने का समय नहीं देता जबकि वह मेरे सामने खाली बैठा है | वह न्यायालय जहाँ जज और उनका स्टाफ मोबाइल पर बात करता है जो पब्लिक के लिए बैन है | सब जानते हैं अदालत में बिना रिश्वत के तारीख नहीं मिलती और इसकी vedio रिकॉर्डिंग पर एक्शन हो सकता है क्योंकि आपके ऊपर कैमरा / मोबाइल अन्दर ले जाने का मुकदमा पहले चलेगा और सजा भी हो जायेगी | क्या आप भूल गए जस्टिस करणन को न्यायालय की अवमानना की सज़ा मिल गयी लेकिन उस पत्र का क्या हुआ जिसमे न्यायालय के कुछ जजों पर उनके द्वारा आरोप लगे थे ? उस जज को मै
अंतर्मन से हुज़ूर कैसे कहूं जो ' एक घायल व्यक्ति जिसने मेरे भाई के उपर गोली चलाई और इस गोली चलाने वाले मुजरिम की सी. सी. फुटेज देखने के बाद भी ' ज़मानत दे देता है, कहता है सही धारा में केस दर्ज नहीं हुआ ?

Friday, 5 January 2018

हमारा संविधान और कानून



 ज़्यादातर कानून महिलाओं की ओर झुकाव के साथ बनाए गए हैं यह मानते हुए कि महिलाओं के साथ ज्यादती होती है, अन्याय होता है, ज़ुल्म होता है | यह बात बगैर बहस के स्वीकार कर भी ली जाये तो फिर जो बचे हुए कुछ यानि 1-2 प्रतिशत पुरुष भी हो सकते हैं जिनके साथ महिलायें ज्यादती, ज़ुल्म और अन्याय करतीं हैं | इस ज्यादती, ज़ुल्म की वजह से कई पुरुष आत्म ह्त्या भी कर लेते हैं, महिलायों के खिलाफ इक्का दुक्का केस भी दर्ज हुए हैं | सालों साल इन गलत और थोथे कानून की वजह से पुरुषों ने मानसिक पीढ़ा सही | दहेज़ और क्रूरता जैसे कानूनों से महिलायों ने न सिर्फ परिवार के सदस्यों को डराकर रखा बल्कि मनमानी की | क्या पूरा का पूरा कानून इस भावना के विपरीत नहीं है कि 100 गुनाह छूट जाएँ लेकिन एक बेगुनाह को सजा ना हो | क्या कानून ने सच में महिलायों को सुरक्षा दी है या फिर घर बर्बाद करने का कवच ?