Sunday, 26 August 2018

आज़ाद भारत की पहली हर दृष्टि से लाभकारी योजना ‘ उज्जवला ‘



आज़ाद भारत की पहली हर दृष्टि से लाभकारी योजना ‘ उज्जवला ‘ है जिसमे न तो सरकार का कोई पैसा खर्च हुआ न किसी और का | न सिर्फ उपभोक्ताओं को लाभ पहुंचा बल्कि देश, सरकार, आयल कंपनी, डिस्ट्रीब्यूटर, manufacturer सभी को लाभ मिला | उपरोक्त सभी को आजीवन प्रति वर्ष बचत और लाभ मिलता रहेगा | सरकार इस बचत का उपयोग अन्यत्र कर सकेगी | आइये जाने कैसे ?
1-      उज्ज्वला योजना में सरकार ने चार वर्षो में 6 करोड़ लोगों को गैस कनेक्शन से लाभान्वित करने का निर्णय किया | इसकी पात्रता निर्धरित की | एक गैस कनेक्शन पर प्रति उपभोक्ता केंद्र सरकार ने रु 1800/- का धन उपलब्ध कराया यानि चार सालों में कुल रु 10800/- करोड़ | शेष लगभग रु 1800/- तक प्रति उपभोक्ता आयल कंपनियों द्वारा चूल्हे और प्रथम गैस के लिए लोन दिया गया जिसको उपभोक्ता को गैस पर मिलने वाली subsidy से अगले 1-2 वर्षों में adjust किया जायेगा | इससे गैस कंपनियों को कोई नुकसान नहीं होने वाला सिवाय मामूली ब्याज के | इसके एवज में कम्पनियों को फायदा बढ़ी बिक्री से हमेशा के लिए होगा |
2-      सरकार जिनको यह सुविधा दे रही है उनको केरोसीन की आवश्यकता कम होगी और सरकार को केरोसीन पर आजीवन subsidy की बचत होगी जो इस रु 10800/- करोड़ से कहीं ज्यादा होगी | सरकार को 6 करोड़ उपभोक्ताओं को जो अतिरिक्त सब्सिडी देनी होगी वह भी भरेपूरे उपभोक्ताओं द्वारा स्वेक्छिक सब्सिडी छोड़ने से पूरी हो जायेगी | गरीब उपभोक्ता अन्य उपभोक्ता से आधी से कम गैस की खपत करता है |
3-      उज्ज्वला योजना के दो छुपे हुए बड़े लाभ में से एक है पर्यावरण को होने वाले नुक्सान में कमी | लकड़ी आदि के उपयोग में कमी से अवांछित गैसों के उत्सर्जन में कमी व जंगलों की लकड़ी कटोती में कमी आयेगी |
इस योजना का सबसे बड़ा लाभ गृहणियों एवं उनके परिवारिक सदस्यों के स्वास्थ्य को हुआ | आँखों व सांस संबंधी बीमारियाँ जो लकड़ी उपलों आदि के उपयोग के कारण पनपती थीं अब कम होंगी और उसका लाभ न सिर्फ स्वास्थ्य पर अपितु बीमारी पर होने वाले खर्च में उपभोक्ता व सरकार को भी होगा क्योकि सरकार हज़ारों करोड़ रुपया बीमारी के इलाज पर खर्च करती है |

Saturday, 25 August 2018

मै और मेरा देश



मै यह भावना देश के बहुत से देशवासियों की ओर से रख रहा हूँ | मै इस देश का वासी हूँ और अपनी विशेषज्ञता से देश सेवा करना चाहता हूँ तो क्या एक ही रास्ता है कि लोकसभा या राज्यसभा का इलेक्शन लडू जैसा कि सारे राजनैतिज्ञ ओर पत्रकार कहते हैं | क्या मै अपनी बात नहीं कह सकता यदि मै पत्रकार नहीं हूँ ? लोकतंत्र की इस परिभाषा पर भी विचार होना चाहिए | ऐसे बहुत से विशेषज्ञ हैं जो अपने विषय के माहिर हैं और अपनी सेवायें कहीं और दे रहे हैं लेकिन उनकी सेवाओं की देश को लोकसभा / राज्यसभा में उनके विषयों पर विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है | हमारे प्रतिनिधि जो लोकसभा / राज्यसभा में जाते हैं वह किसी एक दो विषय के माहिर हो सकते हैं लेकिन सभी विषयों के नहीं जबकि वह लोकसभा / राज्यसभा में पूरी विशेषज्ञता दिखाते हैं या फिर बोलते ही नहीं और उसका नुक्सान अक्सर बिलों में दिखाई देता है | जो विशेषज्ञता उपलब्ध है उसका हम उपयोग नहीं करते और अक्सर नज़र अंदाज़ करते हैं | टी. वी. पर debate में उनके विचार खो जाते हैं और सांसदों तक नहीं पहुँचते, और वैसे भी ज्यादातर सांसद तो अहंकार में डूबे होते हैं और उन इक्का दुक्का लोगों के विचार को सुनते ही नहीं, वह तो अपने को सर्वोपरी मानते हैं | टी. वी. anchor जो निश्चित ही विशेषज्ञ नहीं है, विशेषज्ञ की हैसियत से राय रखता है क्योकि माइक उसके हाथ में है | टी. वी. anchor देशवासियों का नाम लेकर ‘देश पूछ रहा है’ जबकि देश को तो अभी खबर भी नहीं है अपने उलटे सीधे सवाल दाग देता है |
मेरा सुझाव है कि क्योंकि वह हमारे चुने हुए प्रतिनिधि हैं संसद में वोट देने का अधिकार उन्हें है | संसद वोट देने के लिए हो बहस के लिए नहीं, वैसे भी बहस की विशेषज्ञता संसद के बाहर ज्यादा है अन्दर कम | संसद में कई बिल बगैर बहस के भी पास हो जाते हैं या बगैर सार्थक बहस के | संसद अवरोध भी बहस के कारण होता है | बिल संसद में रखा जाये और टी.वी. पर official डिबेट के लिए 15-30 दिन के लिए अनिवार्य रूप से लोकसभा / राज्यसभा चैनेल पर रखा  जाये | सांसद जो भाग लेना चाहें भाग लें और विशेषज्ञों को विशेष निमंत्रण दिया जाये | बाकि विशेषज्ञों को भी दूसरे चैनल पर अपनी राय रखने का मौका होगा | पार्टी से हटकर आम राय भी सामने आयगी |

Friday, 24 August 2018

न्यायालय और न्याय



डाक्टर अस्पताल में ठीक से इलाज न करे, इलाज के दौरान तबियत खराब हो जाये या मरीज मर जाये, डाक्टर ड्यूटी पर न हो | मारपीट, हड़ताल, तोड़फोड़ अक्सर सुनने को मिलती है | क्या आपने कभी किसी जज या न्यायालय के विरुद्ध ऐसा व्यवहार देखा है, जबकि वह सालों साल आपको न्याय नहीं दे पाता, बिना बात तारीखों पर तारीखें देता रहता है, हर तारीख के लिए उसके सामने बैठा अधीनस्थ पैसे लेता रहता है, मोबाइल और फोटो अन्दर मना है, सम्मन जारी होने न होने की उसकी कोई जिम्मेवारी नहीं, किसी की हिम्मत नहीं कोई सवाल कर ले, किसी के भी विरुद्ध कोई भी टिप्पणी करे और दर्ज भी ना करे, शहंशाह की तरह, कोई जवाबदेही नहीं ?
वकील आपको सुबह 11 बजे बुलाता है खुद 12 बजे आता है | आप कोर्ट में जाते हैं, जज साहब अभी आये नहीं हैं, भीड़ बढ़ती जा रही है | यदि हड़ताल हो गयी तो डेट लेनी होगी, यदि नहीं तो भी डेट ही मिलेगी, आप 20-25 कि. मी. दूर से छुट्टी लेकर या काम छोड़कर आये हैं | वकील को फीस और जज साहब सारी सुविधायों सहित वेतन मिल रहा है | कितने केस सुने, क्या किया कोई नहीं पूंछ रहा है | समाज की सारी बुराइयों पर भाषण देने की ज़िम्मेदारी भी इनके ही कंधों पर है | चेक जैसे मामूली केस जिस पर 2 मिनट से ज्यादा का काम नहीं, 2 साल में बयान तक नहीं हुए | जब भी फैसला आयेगा जज साहब का सहयोग 2 मिनट का ही होगा | डाक्टर आपको या तो जल्दी ही स्वस्थ कर देता है या फिर आपकी बीमारी पर लाचारी दिखा सकता है, यहाँ तो आप हर रोज मर रहे हैं | पहले राजा न्याय करता था और उसकी समीक्षा उसके न्याय से होती थी, अब न्याय व्यवस्था न्यायालय के सुपुर्द और ज़िम्मेदारी किसी और की |

Design suggestion in A.C. coaches

There is always room for improvement as per Japanese word ‘Kaizen’. The improvement suggestion should come from bottom/ user which may be reviewed by implementers that is why I am here.
1-      Mob/ Laptop charging points separately for all berths, in II A.C. For LB, just below UB back panel near reading light and similarly for UB just below the roof.
2-      Folding eating table for all berths. In II A.C. for UB, double folding type to occupy minimum space on side panel and similarly for LB. The side table is not sufficient and comfortable for eating. Side panel is good enough to keep small belongings.
3-      A.C. loures should be adjustable in each coupe and may be closed if required.
4-      T.V. facility with blue tooth device just below fan.
5-      Curtains in three pieces, two for berths and one for centre.
6-      One more rack just below mirror similar to above mirror.
7-      Two pillows to be provided instead of one ( may be on chargeable basis ) as it is very small and thin & elderly people or others may require side pillow.
8-      Digital display of route and next station on the pattern of metros as one does not know sitting inside particularly in night hours.
9-      Vacuum toilet is only solution for cleanliness as in flights.
10-  Wash basin taps may be adjustable and spray type to save water.
11-  Side berths length in II A.C. to be increased with little bit width reducing two number of berths in total. If not possible fare of II A.C. side berths should be equivalent to III A.C. as there is no additional facility.

Wednesday, 15 August 2018

कार्य के प्रति ईमानदारी

आम तौर से हम पैसे की ईमानदारी को पूरी ईमानदारी मानते हैं और व्यक्ति विशेष को पूरे सम्मान का अधिकारी मानते है | ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि समाज में ऐसे लोग कम ही दिखाई देते हैं | यह लोग विशेष सम्मान के अधिकारी हैं भी | ईमानदारी का दूसरा बहुत ही महत्व पूर्ण पहलू है कार्य के प्रति ईमानदारी | ज़्यादातर व्यक्तिगत ईमानदारी रखने वाले लोग कार्य के प्रति ईमानदार होते हैं लेकिन सभी नहीं | इसमें यदि राजनीतिज्ञों को शामिल कर लें तो यह संख्या और कम हो जाएगी | आम तौर पर लोग मानते हैं कि राजनीति और व्यापार में समझोते करने होतें हैं | उन समझोतों को बईमानी नहीं माना जाता | व्यक्तिगत ईमानदारी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाती है लेकिन कार्य के प्रति ईमानदारी पूरे समाज व देश को लाभ पहुंचाती है | उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी से चंद रुपयों का लाभ ही समाज को मिल पाता है लेकिन उनका एक फैसला हमेशा के किये समाज को लाभ अथवा हानि पहुंचाता है | इस बात को अच्छी तरह समझने के लिए आप उच्चतम न्यायालय का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ अनेको ईमानदार न्यायाधीश हुए लेकिन बहुत ही कम जिन्होंने कार्य और समाज के प्रति निष्ठा रखी व सरकारों के प्रति नहीं | न्यायाधीशों के पास समाज के उत्थान ने लिए बहुत गुंजाइश होने के बावजूद, उन्होंने इस्तेमाल में कंजूसी दिखाई | न्यायधीशों की निष्ठा यदि सिर्फ अपने कार्य के प्रति होती तो वह राजनैतिज्ञों को उनकी मनमानी और भ्रष्टाचार से रोक सकते थे |
ईमानदारी को और अधिक परिभाषित करें तो यह दो तरह की होती है एक तो पैसे की ईमानदारी और दूसरी वैचारिक ईमानदारी | वैचारिक ईमानदारी का ही हिस्सा है कार्य के प्रति ईमानदारी | पैसे के प्रति ईमानदारी काफी लोगों में पाई जाती है | पैसे की ईमानदारी से देश व समाज का कुछ भला तो होता ही है लेकिन यह यह आत्म संतुष्टि भी देती है | जो लोग आत्म संतुष्टि से संतोष नहीं कर पाते, फिसलकर बईमानी की ओर चले जाते हैं | पैसे से ईमानदार, वैचारिक ईमानदारी भी रखता हो, यह ज़रूरी नहीं लेकिन वैचारिक ईमानदार व्यक्ति के लिए पैसे की ईमानदारी अनिवार्य शर्त है | वैचारिक ईमानदारी का ही एक हिस्सा है कार्य के प्रति ईमानदारी| बहुत कम लोगों में इस वैचारिक ईमानदारी को देखा जा सकता है | उदहारण के लिए न्यायालयों में अनेकों पैसे से ईमानदार न्यायधीश हुए लेकिन उनका झुकाव शासित अथवा विरोधी राजनैतिक पार्टी के साथ होने की वजह से देश और समाज को वह नहीं दे पाए, जिसकी आवश्यकता है | अनेको उदहारण है जब न्यायालयों से लोगों की अपेक्षाएं जुड़ी थीं जैसे कैम्पाकोला सोसाइटी केस | जिनके फ्लैट खाली कराकर तोड़ दिए गए उनको तो ज़रुरत से ज़्यादा सजा मिली लेकिन उन भ्रष्ट आफिसर्स और राज नेताओं का क्या, जिनके कारण यह सब हुआ? लेकिन ऐसे बहुत से केस जो सामाजिक और राजनैतिक सरोकार के रहे और सालों साल उनका नंबर नहीं आया या कभी भी नहीं आया और वह अपनी मौत मर गए, जैसे आम आदमी पार्टी का दिल्ली विधान सभा गठित ना होने पर भंग कराकर दुबारा चुनाब कराने की गुहार | प्रधानमंत्री बनते ही मोदी जी द्वारा दागी सांसदों के केस की जल्दी सुनवाई को उच्चतम न्यायालय द्वारा नकार देना | कई बार साधारण, अनावश्यक केस को एक दो दिन में ही सुन लिया जाना | विवेक के नाम पर अजीब अजीब फैसलों का दे दिया जाना | अनावश्यक रूप से व्यक्तिगत टिप्पड़िया किया जाना, कई बार डिकटेटरशिप का आभास कराते हैं | स्वयं अपनी नियुक्ति के लिए कोलोजियम सिस्टम बना लिया जाना जो विश्व में कही भी लागू नहीं | सभी लोग कहते हैं कि हमें न्यायालय में विश्वास है लेकिन न्यायालय को संविधान में कितना विश्वास है यह कहना कठिन है | न्यायालय ना सिर्फ अपनी समीक्षा से बचता है बल्कि किसी को अपने उपर टिप्पड़ी को अपना अपमान मानता है | न्यायाधीश न्युक्ति की दलील तो देते हैं लेकिन दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पास बिल को लागू करने में अड़ंगे लगाते नज़र आते हैं | कहा जाता है सत्य एक होता है और जो समय और परिस्थितियों के साथ बदलता नहीं | न्यायालयों से अगर सत्य की वाणी उद्घोषित होती है तो फिर बेंच के दो न्यायधीशों की राय अलग कैसे हो जाती है | कहा जाता है कि सत्य समय और परिस्थितियों के अनुरूप बदलता नहीं है | सिर्फ सत्य ही अपरिवर्तनशील है | 1975 के आपातकाल के समय भी बहुत से न्यायधीशों ने कार्य के प्रति ईमानदारी नहीं दिखाई और देश को आपातकाल में ना सिर्फ धकेलने का काम किया बल्कि गलत फैसले देकर लोगों के अधिकारों का हनन किया | बहुत से उनके साथी न्यायाधीश आज भी उन फैसलों को गलत और अपने निजी स्वार्थ की वजह मानते हैं | हमारे देश में लोग सुबह राम कृष्ण को पूजते है और शाम को उनके कार्यों की समीक्षा करते है लेकिन न्यायालय हो या मीडिया आलोचना पचा नहीं पाते | माडिया और न्यायालयों को उनकी आलोचना पगला देती है और वह किसी हद तक जाने को तैयार रहते हैं | वैचारिक भ्रष्टाचार से घिरे राजनेताओ की तो बात ही क्या की जाए | कार्य के प्रति ईमानदार दो व्यक्तियों के नाम तुरन्त ही मस्तिष्क में आते हैं, होंगे बहुत सारे और सभी क्षेत्रों में | भूतपूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री और भूतपूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अबुल कलाम | वैचारिक ईमानदारी अपने आस पास रहने वालों में भी देखी जा सकती है | तटस्थ रहकर फैसले लेना स्वयं और समाज देश के लिए हितकारी होता है | मुंशी प्रेमचंद की पञ्च परमेश्वर बेहतरीन उदाहरण है |