Monday, 13 November 2017

बर्बाद होता भारतीय समाज



     
मेरा एक सहपाठी जो मल्टीनेशनल कंपनियों में काम करते हुए भारत के अलग अलग शहरों में रहा, वैसे वह कानपुर का रहनेवाला है, अब अमेरिका का सिटीजन होकर न्यू जर्सी में बस गया है | पिछले दिनों विशाखापत्तनम में एक जापानी कम्पनी में काम करने कुछ वर्षों के लिए आया था | कहने लगा मै तो भारतीय समाज को देखकर हैरान हूँ मुझे तो अब अमेरिका का खुला समाज बेहतर लगता है, यहाँ के extra ordinary show off और खुले पन को देख कर हैरान हूँ | अभी पिछले दिनों whatsapp पर एक महिला वकील के मैसेज को पढ़कर हैरानी हुयी कि आजकल माँ बाप अपने बच्चों को विवाह का मतलब समझा नहीं पा रहे हैं और नतीजा शादी के कुछ दिनों बाद ही तलाक के केस देखने को मिल रहे हैं | माँ बाप समझा नहीं पा रहे है उच्च शिक्षा का मतलब सिर्फ अच्छा कैरियर नहीं है | अगर हम विवाह कर रहें हैं तो विवाह का अर्थ समझना चाहिए | एक दूसरे के प्रति प्यार, समर्पण, संतानोत्पत्ति, पति पत्नि दोनों का मूल परिवारों से लगाव आदि |
मै अपने पुत्र के लिए जो IIT और फिर दुनिया की मेडिकल साइंस की सबसे अच्छी यूनिवर्सिटी John Hopkins, USA से मास्टर डिग्री लेकर भारत में नौकरी करने लगा, पुत्र वधु की खोज में बदलते समाज को देखकर हैरान रह गया | क्योकि मै जन्म पत्री में विश्वास नहीं करता हूँ और मेरी एक साधारण सांस्कारिक परिवार की साधारण लडकी की तलाश थी, मै समझता था मुझे ज्यादा दिक्कत नहीं होगी | जैसा कि समाज में रिवाज़ है पूछते थे आपकी requirement ? मेरा एक ही जवाब : मै किसी भी तरह का कैश अथवा विशेष उपहार शादी से पहले या बाद में स्वीकार नहीं करूंगा | लड़के लड़की को कपड़ा, मामूली जेबर आदि देना चाहेंगे तो वह आपका विषय होगा, उनका घर बसाने की ज़िम्मेदारी मुझपर | शादी पर जितने लोगों को खाना खिलाना पसंद करें, उतने ही आएंगे | मैंने ऐसा किया भी और शादी के रिसेप्शन पर कैश और उपहार अपने रिश्तेदारों और मित्रों से भी स्वीकार नही किये |
अब वापिस विषय पर आते हैं | पुत्र 35-40 लाख के क़रीब पैकेज मिलता था और वह यही कहता था कि ज़िन्दगी को भरपूर जीना चाहता हूँ, 8 घंटे काम करना ज़रुरत, पद और पैसे की दौड़ मेरा उद्देश्य नहीं | उच्च शिछित पद और पैसे की महत्वकांक्षी लड़कियों की ओर रुख नहीं किया | ज्यादातर लड़कियों में indicisiveness देखने को मिली | ऐसी indicisiveness पहले देखने को नहीं मिलती थी | हमारे परिवार में अब से 50 साल पहले मेरी बहने इलाहाबाद और बनारस में शिक्षा के लिए हॉस्टल में रहीं और नौकरी भी की | मेरी एक बहन ने कानपुर IIT से Ph.D. कर पहले परिवार बढ़ाया और फिर नौकरी | छोटे भाई की पत्नि ने Ph.D. कर परिवार पूरा किया और साथ में अपना व्यवसाय | एक दूसरी भाभी ने भी नौकरी और परिवार साथ चलाये | ज़्यादातर लड़कियों में indicisiveness देखने को  नहीं मिलती थी | कोई भी लडकी स्वतंत्र जीवन जीना चाहती है, संतानोत्पत्ति नहीं चाहतीं, तो वह उसका अधिकार है लेकिन फिर विवाह क्यों ? हर व्यक्ति अपना जीवन जीने के लिए स्वतंत्र हैं और सभी लड़कियां भी, लेकिन विवाह कर उन्हें किसी दूसरे के जीवन से खेलने का क्या अधिकार ?

Sunday, 5 November 2017

Election Reform



                                                           
चुनाव आयोग election reform में महत्त्व पूर्ण भूमिका निभा सकता है, जैसे कि शेषन जी ने वर्षों पूर्व संविधान के तहद और उसी व्यवस्था के रहते ऐतिहासिक कदम उठाया और सभी कुछ ना नुकर के बाद मानने को बाध्य हुए | संविधान से कहाँ से क्या बिन्दु उठाकर लाना है इसे सिविल सेवा के अधिकारी बखूबी जानते हैं |  चुनाव आयोग को अब उनके द्वारा सभी राजनैतिक प्रत्याशियों और पार्टियों को हर शहर और कस्बे में अनेक मंच बिना पैसा लिए लाटरी सिस्टम से उपलब्ध करा देना चाहिए | वहां कुछ धन विज्ञापन के जरिये उगाहाना चाहिए और सरकार से अपने लिए फण्ड बढाने की मांग करनी चाहिए | इलेक्शन के लिए अन्य सामिग्री एक जैसी प्रिंट करायें और प्रत्याशियों को पैसा लेकर दें | प्रत्याशियों के खर्चे की सीमा कम कराने को सरकार से अनुरोध करें | जुलूस और लाउड स्पीकर सभा स्थल के अलावा प्रतिबंधित हों | मंच, कुर्सी, दरी इत्यादि पहले दिन से आखिरी दिन तक उपलब्ध हो | सभी अखवारों और टी.वी. में प्रत्याशियों की लिस्ट जारी करें | दीवारों आदि पर पोस्टर प्रतिबंधित हों | चुनाव आयोग ही बैनर लगाकर प्रत्याशियों की लिस्ट जारी करें | इसमें कुछ पैसा विज्ञापन से अर्जित किया जा सकता है | टी.वी. पर प्रत्याशियों की बहस के लिए टी.वी. से पैसा वसूल करें | यदि आवश्यक हो तो सरकार से बिल पास कराने का अनुरोध करें ताकि सरकारी पैसे की बचत हो | टी. वी. चैनल से बहस का पैसा लेना अजीब लग सकता है लेकिन कुछ समय बाद यह ठीक लगने लगेगा जब सरकार बिल पास  करा लेगी | वाहन अधिग्रहण करने की जगह खुले बाज़ार से बाज़ार भाव पर विज्ञापन कर इलेक्शन टीम के लिए वाहन लें ताकि उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे और व्यापारी वर्ग के साथ न्याय हो सके |
राजनैतिक पार्टियों को एक रुपया भी कैश में लेने का अधिकार क्यों हो जबकि गोलगप्पे भी कैशलेस प्रक्रिया से खाने की बात हो रही हो | जब सरकार कहती है सबके बैंक एकाउंट खुल गए हैं और यदि नही तो वह चन्दा देने से पहले खुलवा ले | स्रोत 100% पारदर्शी क्यों नहीं ?

बांड का गड़बड़ घोटाला क्यों ?
इलेक्शन के लिए राजनैतिक पार्टियों या प्रत्याशियों को सरकारी funding का कोई भी औचित्य समझ नहीं आता है | क्या संविधान में इलेक्शन लड़ना ही अकेला संवैधानिक अधिकार है, चाहे आप अंगूठा छाप हो या जेल में ? जब टैक्स के पैसे को इनको देने की बात होती है तो फिर कल कोई व्यक्ति कह सकता है मुझे शिक्षा और व्यवसाय के लिए लोन दो वह भी बगैर ब्याज के और ब्याज क्यों, मै तो मूलधन भी वापिस नहीं करूंगा | नहीं तो भ्रष्टाचार करूंगा जैसे कि राजनैतिक दल और बुद्धिजीवी रोज़ दलील देते हैं ?
इलेक्शन के लिए क्या सचमुच में पैसा चाहिए, वह भी आज के इलेक्ट्रोनिक युग में जब पलक झपकते ही सन्देश एक स्थान से दुसरे स्थान पर पहुंच जाता है | क्या प्रत्याशियों के लिए मतदाता को चिल्ला चिल्ला कर बताना होगा कि मै भी खड़ा हूँ ? क्या मतदाता इतना बेखबर है ? यदि हाँ तो क्या आप ऐसे मतदाता को खबरदार कर सकते हो ?

Monday, 30 October 2017

आरक्षण में विरोधावास





आरक्षण जातीय आधार पर दिया जाता है और आर्थिक आधार पर मांग को बराबर ठुकराया जाता रहा है | एक बार जो भी पढ़ाई अथवा नौकरी में आरक्षण पा जाता है उसका समाज में उत्थान हो जाता है, उसका सामाजिक स्तर स्वयं बदल जाता है यानि उसका व उसके परिवार में किसी की भी आरक्षण की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, तो फिर क्रीमी लेयर के नाम पर इसमें आर्थिक आधार क्यों घुसा दिया गया ? हमारे न्यायालय भी मौन हैं | किसी की आमदनी एक रुपया हो या एक करोड़, वह आधार क्यों बनना चाहिए ? बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त IIT/ IIM के पास आउट भी जीविका चलाने में कठनाई महसूस करते हैं | अरबों कमाने वाले व्यवसायी भी कई बार धाराशायी हो जाते हैं | सामाजिक और आर्थिक स्तर का यह घालमेल क्यों ? आठ लाख की कमाई करने वाले हिन्दुस्तान में 5-10 प्रतिशत भी नहीं हैं तो फिर बाकि 90-95 प्रतिशत का क्या ? आर्थिक स्तर बनाना है तो सभी के लिए बना दें | सामाजिक रखना है तो फिर सामाजिक ही रखें, यह घालमेल किसलिए ? यहाँ बहस हम आरक्षण पर नहीं सरकार की नियत और घालमेल प्रवृति पर कर रहे हैं जो यह तय नहीं कर पाती कि हमें पहुचना कहाँ है ? या यूँ कहें सरकार हर बात को बखूबी जानती है हमें बेवकूफ मानकर और बनाकर अपनी चालाकियों को हमें स्वीकार करने को मजबूर करती है |

Sunday, 22 October 2017

प्रदर्शन, बंद, रैलियां, धार्मिक ग़ैर धार्मिक जुलूस, आंदोलन के लिए रास्ते बंद




                            
प्रदर्शन, बंद, रैलियां, धार्मिक ग़ैर धार्मिक जुलूस, आंदोलन डेमोक्रेसी का हिस्सा हैं लेकिन डेमोक्रेसी के नाम पर दूसरे देशवासियों जो आपके पक्ष में हों या विरोध में अथवा न्यूट्रल, आप कैसे परेशान अथवा मजबूर कर सकते हैं ? आपका मौलिक अधिकार मेरे मौलिक अधिकार के आड़े नहीं आ सकता और ना ही मेरे अधिकार के ऊपर आ सकता | यह सभी शासन, प्रशासन, यहाँ तक कि न्यायालय भी भूल जाता है और उनको अपनी मनमानी करने देता है | कैसे शासन, प्रशासन और न्यायालय इनके रास्ता अथवा रेल रोकने और तोड़फोड़ करने पर मौन रह सकता है ? न्यायालय जो कभी तो स्वतः संज्ञान लेता है और कभी आधी रात में खुल सकता है, वह कैसे जाट आन्दोलन पर 15 दिन तक रेल्र रोकने पर मौन रहा, यह हमने ऊ. प्र. में कुछ वर्ष पूर्व अमरोहा के पास देखा था और अक्सर देखते ही हैं देश भर में | प्रशासन डरपोक और गुलाम है, शासन वोटों का गुलाम लेकिन न्यायालय को क्या हो जाता है यह मै आज तक भी समझने में असमर्थ हूँ ? कैसे कोई व्यवस्था दिनो दिन तक इस पर अपनी मजबूरी ज़ाहिर कर सकती है ? कैसे सरकारी अथवा प्राइवेट संपत्ति के नुक्सान पर सभी राजनैतिक, सामजिक पक्ष और मीडिया सिर्फ मौखिक खेद व्यक्त कर अपने कर्तव्य से छुटकारा पा सकते हैं ? क्या आप "भीड़ के नाम पर किया गया नुक्सान" कहकर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं ? क्यों नहीं प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर सजा व नुक्सान की भरपाई की जाती है ? क्यों नहीं किसी को लिखित रूप में ही प्रदर्शन एवं बंद की अनुमति किसी ख़ास जगह पर दी जा सकती ताकि बाकि देशवासियों को परेशानी ना हो, रास्ता नहीं बदलना पड़े | हो उलटा रहा है प्रदर्शनकारियो को आज़ादी और बाकि देशवासियों को प्रतिबंधित किया जा रहा है, उनके रास्ते बदले जा रहे हैं | पुलिस वाला कहीं भी हाथ देकर दूसरी ओर मुड़ने का इशारा कर देता है | आपका घर चाहे 50-100 कदम की दूरी पर हो, आप अपने घर गाडी नहीं ले जा सकते | इलेक्शन कमीशन भी किसी से पीछे नहीं | व्यवस्था के नाम पर नोमिनेशन के लिए कई दिन तक रास्ते बंद करवा देता है | किसलिए जुलूस और रैली सड़कों पर इज़ाज़त अथवा बगैर इजाज़त हों ? दे दीजिए उनको रामलीला ग्राउंड या फिर भीड़ भाड वाले इलाकों से दूर मैदान, शर्तों के साथ | एक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण, यह कैसा न्याय ?