माननीय मुख्य न्यायधीश दिनांक : 15-03-2020
सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली
महोदय,
आप अपने व्यक्तिगत अधिकारों की बात करते हो | आम लोगों के सामने अपना रोना लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हो | अपराधियों के अधिकारों
की बात करते हो | आतंकियों के भी मानव अधिकारों की बात करते हो | पीड़ितों के अधिकारों की बात नहीं करते | निर्भया काण्ड हो या 1984 या 1990
का कश्मीर या फिर शाहीन बाग़ | पोस्टर लगने पर स्वतः संज्ञान लेते हुए छुट्टी वाले दिन बैठते हो | आप सालों साल से जाट आंदोलन हो या किसान आंदोलन या आरक्षण
आंदोलन,
रेलवे लाइन और सड़क जाम करने पर हफ़्तों और महीनों मुँह में दही जमाये बैठे रहते
हो |
1984 हो 1990
स्वतः संज्ञान तो छोड़िये आज तक सभी दोषियों को सज़ा नहीं हुयी | जब फांसी की सज़ा सिर्फ
किताबों में हो तो कैसे अपराध रुकने की कल्पना की जा सकती है | 75-80 दिन छोड़िये एक दिन भी
यदि सर्वोच्च न्यायालय का रास्ता बंद हो जाए या सर्वोच्च न्यायालय के एक जज के घर
के आगे प्रदर्शनकारी बैठ जाये तो आप सर के बल खड़े होकर आधी रात में रास्ता खोलने का आदेश दे दोगे, वार्ताकार नियुक्त नहीं करोगे | मेरा सुझाव है आप हर शहर कस्बे में वार्ताकार नियुक्त करो जो प्रदर्शन कारियों
द्वारा सड़कों, रेलवे लाइन जाम करने पर या फिर अपने रोज़गार के अधिकार के तहद सब्ज़ी फल या चाट
बेचने के लिए अतिक्रमण करने पर उनसे वार्ता करे क्योंकि आम आदमी का कोई मौलिक
अधिकार नहीं उसका हनन किया जा सकता है जैसा कि आपके सर्वोच्च न्यायालय के माननीय
कहे जाने वाले न्यायधीशों ने केस 39940 वर्ष 2018 में किया |
न्यायालय का पूरा आचरण संदिग्धता के घेरे में आता है जब आप चिदंबरम की सुनवाई में देरी नहीं करते | देश में वकीलों की गुंडागर्दी और हड़ताल का संज्ञान नहीं लेते | कभी किसी वकील को सज़ा
नहीं देते | सर्वोच्च न्यायालय का न्याय तो संदिग्धता के घेरे में आता है जब वह अपने ही
फैसले को उलटता पलटा रहता है | एक मुख्य न्यायधीश अपने आप को
स्वयं पर लगे झूंठे आरोपों को बिना अदालत के सामने प्रस्तुत हुए 4 दिन में निपटा लेता है |
मुख्य न्यायाधीश मीडिएशन की बात करते हैं | मीडिएशन समय की बर्बादी और दलाली के सिवा कुछ नहीं | केस 39940 वर्ष 2018 में Ms सुषमा मनचंदा नाम की मीडिएटर को
न्युक्त किया गया | केस के बारे में उन्हें कुछ पता नहीं था | पढ़ने से इंकार किया | हमसे कहा 50 लाख दे दो छुट्टी पायो | हमने इंकार किया | तीसरी तारीख पर कहा 80 लाख दे दो |
हमने फिर इंकार किया | तीन सिटिंग हुईं लेकिन कोई सार्थक बात नहीं सिर्फ दलाली | प्रतिपक्ष ( आवेदिका )
का वकील भी लार टपकाए घूमता रहा | 4-5 माह बर्बाद हुए | मीडिएटर मनचंदा ने
किसी भी मीटिंग के मिनट बनाने से इंकार किया |
आप बात तो न्याय की करते हो और आये दिन चुपके से लगाए गए केस पर स्टे दे देते
हो | क्यों कैवेट की जरूरत
होनी चाहिए? क्यों दूसरे पक्ष को सुने बिना आर्डर दिया जाना चाहिए? क्यों नहीं नोटिस दिया
जाना चाहिए? झूंठे 498 a केस में प्रतिपक्ष को बिना सम्मन दिए अदालत ज़मानती और गैर ज़मानती वारंट जारी
करने पर उतारू है |
क्यों तारीखें दी जायें? क्यों हर प्रार्थना पत्र पर अगली सुनवाई की जाए? उसी समय वकील कुछ कहना चाहें तो क्यों ना कह दें? भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश ने स्वयं अयोध्या केस में कड़ा रुख अपनाकर वकीलों की
चालाकियों को दर किनार किया था | क्यों झूंठे शपथ पत्रों पर सज़ा नहीं
होनी चाहिए? मैं जिस केस को लड़ रहा हूँ उसमे तीन अलग अलग अदालतों में तीन विरोधावासी शपथ
पत्र दिए गए हैं |
आज जब स्पीड पोस्ट 72 घंटे में पहुँचती हो आपके सम्मन सालों साल तक तामील नहीं होते | क्यों नहीं पुलिस
इंस्पेक्टर की जवाब देही तय हो? अदालत में बैठा क्लर्क
और वकील का मुंशी सालों साल पैसे ऐंठता रहता है | 39940 वर्ष 2018 केस ट्रांसफर के फैसले को सर्वोच्च न्यायालय ने कछुए की पीठ पर रख दिया जो
करीब 6
माह में निर्घारित कोर्ट में पहुंचा जबकि सर्वोच्च न्यायालय का आदेश 6 माह में फैसला देने का
था |
आपसे विनम्र निवेदन है कि न्यायिक सिस्टम में सुधार की न सिर्फ बात करें बल्कि
अपने कार्यकाल में सुधार भी करा दें | मैने भूतपूर्व मुख्य न्यायाधीश श्री गोगोई जी को एक पत्र में सलाह दी थी जो आप
को भी देने की धृष्टता कर रहा हूँ | स्व. श्री टी. एन. शेषन जी ने बिना कानून में बदलाव कराये निर्वाचन आयोग में
सुधार कर दिए थे जो आज तक आगे बढ़ रहे हैं और इसीलिए कोई भी व्यक्ति किसी दूसरे
मुख्य निर्वाचन अधिकारी का नाम जानता हो या नहीं उनका नाम अवश्य जानता है |
भवदीय,
सुबोध कुमार अग्रवाल
307 पुरानी आवास विकास कॉलोनी
सिविल लाइन्स रामपुर उ. प्र. 244901 मोबाइल: 9837100538
प्रतिलिपि: 1- माननीय राष्ट्रपति भारत सरकार 2- माननीय उपराष्ट्रपति भारत सरकार
3- माननीय अध्यक्ष लोकसभा 4- माननीय प्रधान मंत्री भारत सरकार
5- माननीय गृह मंत्री 6- माननीय कानून और न्याय मंत्री