लोक सभा में नाम स्पीकर लेकिन बोलते कुछ नहीं सिबाय " शांत हो जाइये " " बैठ जाइये " आदि के | मीडिया में नाम एंकर लेकिन बोलते ही रहते हैं शुरू से आखिर तक | कुल समय का आधे से ज़्यादा समय खुद खा जाते हैं फिर कहते हैं समय की कमी है | अरे भाई इतना ही शौक है बोलने का तो मेज के दूसरी तरफ औरों के साथ बैठिये | मेहमान की बात को ऐसे समझाते हैं जैसे अकेला वही समझदार और बाकी सब श्रोता बेवकूफ | सबको सर्टिफिकेट बाटते हैं और स्वयं के लिए कहते हैं कि हमें आपके सर्टिफिकेट की ज़रुरत नहीं | एक एंकर कहने लगा मुझे सीना नापने के लिए इंचीटेप लेकर बैठना होगा | मैने मेल किया कि साथ में दूध और पानी की बाल्टी लेकर भी बैठा करो क्योंकि रोज़ आप " दूध का दूध पानी का पानी " बोलते हो | नेताओं को दोष देते हैं जातिवादी राजनीति के लिए और आकड़ें स्वयं प्रस्तुत करते हैं | स्वयं को देश समाज से ऊपर न्यायवादी बताते हैं |
" देश पूंछ रहा है " जैसे वाक्य बोलते हैं जबकि घटना तो अभी अभी घटी है और देश को अभी पता भी नहीं है | अपने सवालों को देश के सवाल नाम देकर हल्ला करते रहते हैं जबकि देश से तो पूंछते ही नहीं की सवाल हैं क्या? यदि खाना पूर्ति के लिए माइक कैमरा ले भी गए तो उसे बोलने का मौक़ा ही नहीं देते, जल्दी में रहते हैं |
एक मेहमान बोलता है और दूसरा हस्तक्षेप करता रहता है | एंकर जानबूझकर चुपचाप बैठा रहता है | शायद स्कूल के समय में उसने इसी तरह की घटिया डिबेट देखी होंगी | डिबेट के बीच में किसी को हाँ हूँ कहने की इज़ाज़त क्यों होनी चाहिए ? क्या इसलिए कि सब्ज़ी मसालेदार होनी चाहिए ? कच्ची सब्ज़ी परोसने की टी. वी. चैनेल की हिम्मत नहीं ? अपने ज़ायके की सब्ज़ी खाने का आपको अधिकार नहीं, रेस्टॉरेंट में उनके ज़ायके की सब्ज़ी खाइये, कच्ची सब्ज़ी तो उपलब्ध नहीं | यदि कच्ची सब्ज़ी चाहिए तो अपने घर पर उगाइये और खुद का चैनल का रजिस्ट्रेशन कराइये |
" देश पूंछ रहा है " जैसे वाक्य बोलते हैं जबकि घटना तो अभी अभी घटी है और देश को अभी पता भी नहीं है | अपने सवालों को देश के सवाल नाम देकर हल्ला करते रहते हैं जबकि देश से तो पूंछते ही नहीं की सवाल हैं क्या? यदि खाना पूर्ति के लिए माइक कैमरा ले भी गए तो उसे बोलने का मौक़ा ही नहीं देते, जल्दी में रहते हैं |
एक मेहमान बोलता है और दूसरा हस्तक्षेप करता रहता है | एंकर जानबूझकर चुपचाप बैठा रहता है | शायद स्कूल के समय में उसने इसी तरह की घटिया डिबेट देखी होंगी | डिबेट के बीच में किसी को हाँ हूँ कहने की इज़ाज़त क्यों होनी चाहिए ? क्या इसलिए कि सब्ज़ी मसालेदार होनी चाहिए ? कच्ची सब्ज़ी परोसने की टी. वी. चैनेल की हिम्मत नहीं ? अपने ज़ायके की सब्ज़ी खाने का आपको अधिकार नहीं, रेस्टॉरेंट में उनके ज़ायके की सब्ज़ी खाइये, कच्ची सब्ज़ी तो उपलब्ध नहीं | यदि कच्ची सब्ज़ी चाहिए तो अपने घर पर उगाइये और खुद का चैनल का रजिस्ट्रेशन कराइये |