Monday, 22 April 2019

यह कैसा मीडिया ?

लोक सभा में नाम स्पीकर लेकिन बोलते कुछ नहीं सिबाय " शांत हो जाइये " " बैठ जाइये " आदि के | मीडिया में नाम एंकर लेकिन बोलते ही रहते हैं शुरू से आखिर तक | कुल समय का आधे से ज़्यादा समय खुद खा जाते हैं फिर कहते हैं समय की कमी है | अरे भाई इतना ही शौक है बोलने का तो मेज के दूसरी तरफ औरों के साथ बैठिये | मेहमान की बात को ऐसे समझाते हैं जैसे अकेला वही समझदार और बाकी सब श्रोता बेवकूफ | सबको सर्टिफिकेट बाटते हैं और स्वयं के लिए कहते हैं कि हमें आपके सर्टिफिकेट की ज़रुरत नहीं |  एक एंकर कहने लगा मुझे सीना नापने के लिए इंचीटेप लेकर बैठना होगा | मैने मेल किया कि साथ में दूध और पानी की बाल्टी लेकर भी बैठा करो क्योंकि रोज़ आप " दूध का दूध पानी का पानी " बोलते हो | नेताओं को दोष देते हैं जातिवादी राजनीति के लिए और आकड़ें स्वयं प्रस्तुत करते हैं | स्वयं को देश  समाज से ऊपर न्यायवादी बताते हैं |
" देश पूंछ रहा है " जैसे वाक्य बोलते हैं जबकि घटना तो अभी अभी घटी है और देश को अभी पता भी नहीं है | अपने सवालों को देश के सवाल नाम देकर हल्ला करते रहते हैं जबकि देश से तो पूंछते ही नहीं की सवाल हैं क्या? यदि खाना पूर्ति के लिए माइक कैमरा ले भी गए तो उसे बोलने का मौक़ा ही नहीं देते, जल्दी में रहते हैं |
एक मेहमान बोलता है और दूसरा हस्तक्षेप करता रहता है |  एंकर जानबूझकर चुपचाप बैठा रहता है | शायद स्कूल के समय में उसने इसी तरह की घटिया डिबेट देखी होंगी | डिबेट के बीच में किसी को हाँ हूँ कहने की इज़ाज़त क्यों होनी चाहिए ? क्या इसलिए कि सब्ज़ी मसालेदार होनी चाहिए ? कच्ची सब्ज़ी परोसने की टी. वी. चैनेल की हिम्मत नहीं ? अपने ज़ायके की सब्ज़ी खाने का आपको अधिकार नहीं, रेस्टॉरेंट में उनके ज़ायके की सब्ज़ी खाइये, कच्ची सब्ज़ी तो उपलब्ध नहीं | यदि कच्ची सब्ज़ी चाहिए तो अपने घर पर उगाइये और खुद का चैनल का रजिस्ट्रेशन कराइये |

Friday, 12 April 2019

हिन्दू आतंकवाद की सच्चाई


उदय भास्कर जी दैनिक जागरण दिनांक 12-04-2019 में प्रकाशित लेख में सभी ठीक है परन्तु एक बात पर विचार अवश्य करें, उससे पहले मै आपको बताना चाहूंगा कि अपने आप को आस्तिक कहने वाले कुछ लोग मुझ जैसे को नास्तिक कहते हैं लेकिन मुझे हिन्दू संस्कृति और भारतीय सभ्यता प्रिय है जिसका नाश सुनुयोजित तरीके से मुस्लिम नवाबों और अक्रांताओं, ब्रिटिशर्स और अंत में कांग्रेस व अपने आपको सेक्युलर कहने वाले लोगों ने किया | क्या नक्सलवाद में हिन्दू धर्म को बढ़ावा देने वाली कोई बात कभी सामने आयी है या फिर कभी भी तमिल टाइगर फ़ौज ने हिन्दू धर्म की बात की ? गांधी जी की हत्या में एक व्यक्ति शामिल था ना कि एक संस्था और ना ही उस व्यक्ति ने हिन्दू धर्म को बढ़ावा देने के लिए गांधी जी की हत्या की | अगर समझौता एक्सप्रेस में किसी हिन्दू संगठन का हाथ होने की बात भी स्वीकार कर भी ली जाये तो क्या यह हिन्दू धर्म को आगे बढ़ाने के लिए आतंकवाद था ?
सभी स्वयं को बुध्धिजीवी और सेक्युलर कहने वालों की समस्या यह है कि वह सच्चाई से भागना चाहते हैं | विषयों को भटकाना चाहते हैं | क्यों नहीं आप इस्लामिक आतंकवाद पर लिख पाते जो अल्लाह हो अकबर के नारे ही नहीं लगाते बल्कि सारी दुनिया को इस्लाम के रंग में रंग देने का दंभ भरते हैं ? क्यों नहीं धर्म को बढ़ावा देने वाले कश्मीरियों के ऊपर बोल पाते जिन्होंने जबरन इस्लाम कबूल कराया, हत्या की और एक हिन्दू राज्य कुछ शताब्दियों में मुस्लिम बहुल बन गया | जिनकी वजह से कश्मीरी पंडितों को अपने ही देश में शरणार्थियों की तरह रहना पड़ रहा है | आज हम हिन्दू मुसलमान दोनों ही की भारतीय नागरिक होने की बात तो करते हैं लेकिन अन्य विषयों पर आँखें मूँद लेते हैं |
धर्मान्तरण की दलीलों को हम इतनी सहजता से स्वीकार कर लेते हैं कि लगता है कि विश्व के सभी धर्मों में इस्लाम और इसाई धर्म सर्वश्रेष्ठ हैं और इसीलिये लोग पिछली शताब्दियों में उनकी ओर आकर्षित हुए बिना नहीं रह सके | मुस्लिम नवाब, अक्रांता और पादरी तो बस चने ही भूनते रहे | भारत वर्ष जो हिन्दू परम्पराओं ओर मान्य्ताओं से ईरान से बर्मा तक फैला था आज सिकुड़ कर यहाँ आ पहुंचा है | 2500 साल पहले का बौध्ध धर्म जो हिन्दू संस्कृति और पद्धिति के इतना क़रीब है उसका आकर्षण तो समझ आता है और कोई बालात धर्मान्तरण की घटनाएं इतिहास में दर्ज नहीं हैं |

Thursday, 11 April 2019

चुनाव में झूंठे वायदे अपराध क्यों नहीं


आपका एडिटोरियल हिन्दुस्तान अखवार दिनांक 10 अप्रैल 2019 में पढ़ा | कृपया संपादक जी को यह पत्र प्रेषित कर दें |
“ आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी | हिन्दुस्तान अखवार के महोदय यदि किसी अपराध को इसलिए अपराध नहीं मानेंगे क्योंकि सभी इस अपराध को कर रहे हैं | मैने अभी पिछले सप्ताह मुख्य चुनाव आयुक्त को रजिस्टर्ड पोस्ट से पत्र भेजा है और ब्लॉग भी लिखा है आप इच्छुक हों तो पढ़ें “ अपना अपना सोच “ login: apnapnasoch.blogspot.in
क्या चुनाव के लिए सारे नियम ताक पर रखे जा सकते हैं ? चुनाव लड़ना ही क्या अकेला मौलिक अधिकार है ( क्या रोजी रोटी मौलिक अधिकार नहीं ) जो एक अनपढ़ भी लड़ सकता है, चाहे जेल में ही क्यों ना हो ? कुछ भी कहे, कोई भी वायदा करे लिखित अथवा अलिखित, वोट के लिए सामान अथवा कैश दे नहीं लेकिन वायदा करे | आम आदमी के खिलाफ किसी को लिखित अथवा अलिखित वायदा खिलाफी साबित होने पर अपराध मानते हुए दंड का भागीदार होना पड़ सकता है लेकिन राजनीतिज्ञों के लिए कोई सज़ा नहीं चाहे वह वायदा पूरा करे या नहीं | शायद न्यायालय और पत्रकारों ने भी चुनावी वायदों को मज़ाक के रूप में ही लिया है| अभी कल एक पार्टी के अध्यक्ष ने उच्चतम न्यायालय का ज़िक्र कर वह कहा जो उच्चतम न्यायालय ने कहा ही नहीं लेकिन उच्चतम न्यायालय को कोई अवमानना महसूस नहीं होती | प्रचार की हर माध्यम से भरपूर अनुमति के बाद भी चुनाव आयोग का एक पिक्चर और एक टी.वी. चैनेल को बंद करने का आदेश समझ से परे है सिवाय इसके कि अपने आप को ईमानदार साबित करने की कोशिश के | ऐसा सिर्फ वही करते हैं जिन्हें अपनी ईमानदारी पर स्वयं शक होता है | हमारा निर्वाचन आयोग ने तो शेषन जी पहले भी कुछ नहीं किया और बाद में भी | उनका कमाया खा रहे हैं |

Tuesday, 9 April 2019

Traffic police work in Delhi



May I draw attention of police commissioner Delhi towards the working of traffic police in Delhi. There are many good points and need not to be mentioned here as good work is for satisfaction of self and reward in itself.
1-       There are number of places in Delhi rather at each of signal light baggers are not only tapping window glass but also dancing in front of cars and irritating drivers obstructing the traffic. They may become cause of accident. Not only baggers but poor boys and girls who are selling car products on signals are also abuse to the system.
2-       The vehicles including cars and buses block road so that other vehicles behind them already have green signal to go straight and left can’t move until blocking vehicle have green signal to go right. Never found a traffic policeman to challan them.
3-       Buses are major problem creators as they don’t have fear of vehicle damage which car drivers have and buses are never forced to challan.
4-       Everywhere in Delhi people driving dancing from one lane to another due to their nature and secondly buses and small vehicles are moving in same lane and no clear cut rules are there. If at all it is there, you are not checking them. Discipline is maintained by force not by will generally that is why Singapore with 13% Indian population is able to maintain systems there.
5-       Recent incident forced me to write this while I was on the way from Supreme court to Vasant kunj driving myself very consciously as I do in Delhi at the age of 63 with U.P. number, a traffic policeman stopped me asking  money against challan for crossing yellow line. I scolded him badly saying who has crossed yellow line, I am driving in left most lane very consciously? I would not pay here, you may challan, I would ask for camera report. They checked all my documents and allowed me to go saying probably it was somebody else. Their duty was at a place where they could hide themselves and generate legal/ illegal money. The allegation on your department is why the traffic being not checked at number of places where it is required most but posting of traffic policeman for money generation? Just few km. before this I found both sides cars parked in front of congress office causing jam and you don’t dare to touch them. How could you make this country as Singapore while doing partiality?  You don’t touch buses, politicians, administration vehicles, police vehicles itself, baggers, poor class, pedestrians.

Nature has given you an opportunity to serve the people. Work honesty should be on top.

Friday, 5 April 2019

इन्टरनेट कनेक्टिविटी और cheque clearing के सम्बन्ध में







भारतीय रिज़र्व बैंक से निवेदन है कि चेक करें कि बैंकों में क्या 2 कनेक्टिविटी हैं ? यदि हैं भी तो एक ही सर्विस प्रोवाइडर की हैं जिससे दोनो ही डाउन होती हैं| बैंक आये दिन कनेक्टिविटी न होने के कारण न सिर्फ काम रोककर बैठते हैं बल्कि जो cheque clearing के लिए आते हैं उनको भी बाउंस कर रू 590/- दोनों के एकाउंट से डेबिट कर देते हैं | ग्राहक को पैसा तो समय पर नहीं मिलता ऊपर से पेनल्टी | ऐसा हर माह 2-3 बार होता है और कभी कभी 2-3 दिन लगातार भी | अभी रामपुर उ.प्र. में 28-29 मार्च को भी लगातार दो दिन clearing नहीं लगी | मज़ाक तो यह कि एक दिन PNB में तो दूसरे दिन BOB में कनेक्टिविटी नहीं थी और बैच सिस्टम होने के कारण जिनका इन बैंकों से लेना देना भी नहीं था नुक्सान उठाते रहे | हज़ारों चेक एक बैंक के कारण होल्ड हो जाते हैं | बैच clearing सिस्टम समझ से परे है |
बैंक अपनी तरफ से कोई मेहनत नहीं करते वरना clearing और अति आवश्यक कार्य अपनी दूसरी ब्रांच से करा सकते हैं | ऐसा मै इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि एक कर्मठ मैनेजर ने 2-3 साल पहले अपने शहर में दूसरी ब्रांच ना होने पर 30 km दूर दूसरे शहर से यह काम निरंतर कराये और कभी भी हमारा RTGS नहीं रुकने दिया |
हैरानी होती है कि सारे काम तो बैंक के माध्यम से होने ज़रूरी हैं और बैंक कर्मियों को 24 घंटे 365 दिन बिजली, पानी, बस, ट्रेन, हवाई जहाज, टैक्सी, पेट्रोल डीज़ल, फ़ोन, रेस्टोरेंट, होटल सब चाहिए लेकिन वह 250 दिन 7 घंटे से ज़्यादा काम नहीं करेंगें | बच्चों के स्कूलों जितनी छुट्टी करेंगे और फिर हड़ताल भी |
प्राइवेट बैंकों पर भी आपने यही सब रूल्स लाद दिए हैं ताकि पब्लिक को कुछ आसानी न हो जाए |