Sunday, 13 October 2019

सभ्रांत परिवारों की महिलाओं का नाटक

पढ़ी लिखी और दूसरी ऐसी महिलायें जो दबी कुचली नहीं हैं वह अपने महिला होने का वास्ता देकर  समाज की सहानुभूति अर्जित करना चाहती हैं और यही वह महिलायें हैं जो पुरुषों के सिर पर तबला बजा रही हैं | दबी कुचली महिलायें तो बेचारी आज भी अपनी दुर्दशा पर रो रही हैं | यही वह महिलायें हैं जो महिला संगठन के नाम पर प्रदर्शन कर रही हैं जबकि जो दर्द समझ रही हैं वह तो चुपचाप अंदर ही अंदर अपना कार्य कर दबी कुचली महिलाओं को शक्ति प्रदान कर रही हैं | वह मुखर भी नहीं हैं | सहानुभूति की अपील भी नहीं करती हैं | यदि सच कहूँ तो इन मुखर होती महिलाओं को इसमें शामिल कर मुस्लिम तुष्टिकरण की तरह महिला तुष्टिकरण का एक खेल खेला जा रहा है | अब समय आ गया है कि हिन्दू - मुस्लिम, महिला - पुरुष से हटकर सिर्फ आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक आधार पर भी समाज को दो भागों में बटा देखने की आवश्यकता है, एक सभ्रांत और दूसरा दबे कुचले परिवार | इसके लिए रेवड़ियाँ बाटने वाले रेजिस्ट्रेशन की आवश्यक्ता नहीं |