Monday, 30 October 2017

आरक्षण में विरोधावास





आरक्षण जातीय आधार पर दिया जाता है और आर्थिक आधार पर मांग को बराबर ठुकराया जाता रहा है | एक बार जो भी पढ़ाई अथवा नौकरी में आरक्षण पा जाता है उसका समाज में उत्थान हो जाता है, उसका सामाजिक स्तर स्वयं बदल जाता है यानि उसका व उसके परिवार में किसी की भी आरक्षण की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, तो फिर क्रीमी लेयर के नाम पर इसमें आर्थिक आधार क्यों घुसा दिया गया ? हमारे न्यायालय भी मौन हैं | किसी की आमदनी एक रुपया हो या एक करोड़, वह आधार क्यों बनना चाहिए ? बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त IIT/ IIM के पास आउट भी जीविका चलाने में कठनाई महसूस करते हैं | अरबों कमाने वाले व्यवसायी भी कई बार धाराशायी हो जाते हैं | सामाजिक और आर्थिक स्तर का यह घालमेल क्यों ? आठ लाख की कमाई करने वाले हिन्दुस्तान में 5-10 प्रतिशत भी नहीं हैं तो फिर बाकि 90-95 प्रतिशत का क्या ? आर्थिक स्तर बनाना है तो सभी के लिए बना दें | सामाजिक रखना है तो फिर सामाजिक ही रखें, यह घालमेल किसलिए ? यहाँ बहस हम आरक्षण पर नहीं सरकार की नियत और घालमेल प्रवृति पर कर रहे हैं जो यह तय नहीं कर पाती कि हमें पहुचना कहाँ है ? या यूँ कहें सरकार हर बात को बखूबी जानती है हमें बेवकूफ मानकर और बनाकर अपनी चालाकियों को हमें स्वीकार करने को मजबूर करती है |

Sunday, 22 October 2017

प्रदर्शन, बंद, रैलियां, धार्मिक ग़ैर धार्मिक जुलूस, आंदोलन के लिए रास्ते बंद




                            
प्रदर्शन, बंद, रैलियां, धार्मिक ग़ैर धार्मिक जुलूस, आंदोलन डेमोक्रेसी का हिस्सा हैं लेकिन डेमोक्रेसी के नाम पर दूसरे देशवासियों जो आपके पक्ष में हों या विरोध में अथवा न्यूट्रल, आप कैसे परेशान अथवा मजबूर कर सकते हैं ? आपका मौलिक अधिकार मेरे मौलिक अधिकार के आड़े नहीं आ सकता और ना ही मेरे अधिकार के ऊपर आ सकता | यह सभी शासन, प्रशासन, यहाँ तक कि न्यायालय भी भूल जाता है और उनको अपनी मनमानी करने देता है | कैसे शासन, प्रशासन और न्यायालय इनके रास्ता अथवा रेल रोकने और तोड़फोड़ करने पर मौन रह सकता है ? न्यायालय जो कभी तो स्वतः संज्ञान लेता है और कभी आधी रात में खुल सकता है, वह कैसे जाट आन्दोलन पर 15 दिन तक रेल्र रोकने पर मौन रहा, यह हमने ऊ. प्र. में कुछ वर्ष पूर्व अमरोहा के पास देखा था और अक्सर देखते ही हैं देश भर में | प्रशासन डरपोक और गुलाम है, शासन वोटों का गुलाम लेकिन न्यायालय को क्या हो जाता है यह मै आज तक भी समझने में असमर्थ हूँ ? कैसे कोई व्यवस्था दिनो दिन तक इस पर अपनी मजबूरी ज़ाहिर कर सकती है ? कैसे सरकारी अथवा प्राइवेट संपत्ति के नुक्सान पर सभी राजनैतिक, सामजिक पक्ष और मीडिया सिर्फ मौखिक खेद व्यक्त कर अपने कर्तव्य से छुटकारा पा सकते हैं ? क्या आप "भीड़ के नाम पर किया गया नुक्सान" कहकर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं ? क्यों नहीं प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर सजा व नुक्सान की भरपाई की जाती है ? क्यों नहीं किसी को लिखित रूप में ही प्रदर्शन एवं बंद की अनुमति किसी ख़ास जगह पर दी जा सकती ताकि बाकि देशवासियों को परेशानी ना हो, रास्ता नहीं बदलना पड़े | हो उलटा रहा है प्रदर्शनकारियो को आज़ादी और बाकि देशवासियों को प्रतिबंधित किया जा रहा है, उनके रास्ते बदले जा रहे हैं | पुलिस वाला कहीं भी हाथ देकर दूसरी ओर मुड़ने का इशारा कर देता है | आपका घर चाहे 50-100 कदम की दूरी पर हो, आप अपने घर गाडी नहीं ले जा सकते | इलेक्शन कमीशन भी किसी से पीछे नहीं | व्यवस्था के नाम पर नोमिनेशन के लिए कई दिन तक रास्ते बंद करवा देता है | किसलिए जुलूस और रैली सड़कों पर इज़ाज़त अथवा बगैर इजाज़त हों ? दे दीजिए उनको रामलीला ग्राउंड या फिर भीड़ भाड वाले इलाकों से दूर मैदान, शर्तों के साथ | एक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे के अधिकारों का अतिक्रमण, यह कैसा न्याय ?

Sunday, 15 October 2017

न्यायालय के फैसले और मै



 
मै कोर्ट के फैसले के विरोध में नहीं, विरोध तो मेरा कोर्ट के attitude से है | विरोध में होने में कोई न्यायालय अवमानना भी नहीं हो सकती क्योकि 5 में 3 जज समर्थन में 2 विरोध में फैसला देते हैं| मुझे उन 2 जजों के साथ जाने की छूट है  | सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानना मेरी मजबूरी है, लेकिन एक बात मेरी समझ से बाहर है कि जब सत्य एक होता है तो फिर क्या किसी फैसले में सत्य की खोज में, जजों के विचारों का घालमेल हो जाता है और पाँचों एक मत नहीँ हो पाते, सच खो जाता है | एक कोर्ट दूसरे कोर्ट के फैसले को पलट देता है और हम यह कहकर तसल्ली कर लेते हैं कि उसने तथ्यों को दूसरी तरह से देखा | क्या इस तरह की माफी एक डॉक्टर को मिल सकती है? पर्यावरण पर पटाखों पर रोक के मै समर्थन में हो सकता हूँ लेकिन यह मेरी समझ से बाहर है कि यह फैसला आख़िरी समय पर क्यों आया ? यदि याचिका पुरानी थी और आवश्यक थी तो फिर पहले क्यों नहीं सुनी गयी ? यदि आखिरी समय पर आयी तो उनको बाद में सुनने के लिए क्यों नहीं कहा गया ? उन व्यापारियों का क्या जो इस फैसले से जुड़े हैं ? ऊपर जो attitude की बात मैंने की वह यही है कि जब चाहे सुने, जैसे चाहे सुने, जिसे चाहे सुने और जो चाहे comment करें | दूसरा कोई ऐसा करे तो अवमानना | प्रजातंत्र में 5 में से 2 जज शेष जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि फैसले बहुमत के ही मान्य होते हैं | इन फैसलों को कोई भी मानने से इन्कार नहीं कर सकता है लेकिन समीक्षा तो कर सकता है | प्रजातंत्र में न्यायालय सबसे ज़िम्मेदार संस्थायों में से एक संस्था है जिसके छोटे से छोटे फैसले से भी समाज की दिशा बदल सकती है | लगता है मुंशी प्रेमचंद का पंच परमेश्वर कहीं खो गया है |

Monday, 9 October 2017

सड़क पर ट्रेक्टर ट्राली व अन्य जुगाड़ दुर्घटना की बड़ी वजह



               
सड़क पर ट्रेक्टर ट्राली हादसे का सबसे बड़ा कारण है | उसकी कई वजह हैं |
11 -      ट्रेक्टर को कम स्पीड पर खेत में जुताई आदि के लिये बनाया गया है इसलिए चिकनी सड़क पर स्पीड जो स्वयं बढ़ जाती है और अचानक रोकने के लिए ब्रेक पर पूरे शरीर का खड़े होकर ज़ोर लगना पड़ता है फिर भी वह भिड जाता है |
22 -      ड्राईवर को ट्राली लगे होने पर पीछे का कुछ नहीं दिखाई देता है, वैसे भी इसमें रियर मिरर ( पीछे देखने का दर्पण ) नहीं होता है | ट्राली ट्रेक्टर से कहीं ज्यादा चौड़ी और लंबी होती है | ट्राली ना लगी होने पर भी पीछे देखने के लिए पीछे मुड़कर ही देखना होता है मिरर को इसके लिए विशेष रूप से डिज़ाईन करना होगा |
33 -      पीछे लगी ट्रोली में ब्रेक नहीं होते अतः ट्रेक्टर में ब्रेक लगाने पर ट्राली जिसमे वज़न होता है inertia के कारण ट्रेक्टर को धकेलती है | ट्रेन के डिब्बे बहुत अच्छी टेक्नोलॉजी के बाद भी दुर्घटना होने पर एक के ऊपर एक चढ़ जाते हैं, जबकि उनमे ब्रेक भी होता है |
44 -      बगैर ड्राइविंग लाइसेंस के बड़ी संख्या में बच्चे भी ट्रेक्टर ट्राली चलातें हैं | सुबह के समय ट्रेक्टर ट्राली नदी से रेता और जंगल से लकड़ी लातें हैं और पुलिस की वसूली से बचने के लिए अनाप शनाप दौडाते हैं |
55 -      कोहरे और बरसात में, खासतौर पर रात में आगे चल रही या खडी ट्रेक्टर ट्राली दिखाई नहीं देती और पीछे से आने वाला वाहन इसमें घुस जाता है |
66 -      ट्रेक्टर ट्राली में कोई इंडिकेटर लाइट ना होने की वजह से इसके आगे चलने अथवा मुड़ने का पता नहीं चलता | क्योंकि इसको कोई विशेष नुक्सान नहीं होता यह बेपरवाह मुड जाती है और जाम में सबसे पहले निकलने की कोशिश करती है
77 - ट्रेक्टर की ट्राली को अपने डैमेज होने का ख़तरा नहीं होता क्योकि यह देसी तरह का रफ जुगाड़ है और इसके तीनों तरफ तरह तरह के projections दूसरे वाहन को डैमेज करने की छमता रखते हैं, जिसके कारण इसका ड्राईवर ज़रुरत से ज़्यादा लापरवाह होता है |
किसान के नाम पर इस देश में कानून का पालन ना करना जुर्म नहीं है, जबकि ट्रेक्टर गरीब किसान के पास नहीं होता | बगैर टैक्स दिए भी यह दूसरों को नुकसान पहुंचाता है | चलती फिरती मौत सड़क पर तबाही मचाती रहती है |
बसों पर भी कोई पेनल्टी ना होने के कारण आप इनको भी सड़क पर उल्टा सीधा चलते देख सकते हैं | अपने वाहन को बसों, ट्रेक्टर ट्राली से दूरी बनाये रखने में भलाई समझी जाती है |