कृपया
youtube वीडियो "अपना अपना सोच" पर भी मेरे विचार जाने | यह पत्र
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Grievance Management 17821/SCI/PIL (E)/2020
में रजिस्टर्ड |
माननीय मुख्य न्यायाधीश दिनांक : 06-04-2020
सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली
महोदय,
आपके mediation के सम्बन्ध में विचार समाचार पत्र में पढ़े इसलिए आपको इस विषय में जानकारी
उपलब्ध कराने की इच्छा हुई | जिस तरह किसी बदबूदार कमरे में एक अर्से से बैठे व्यक्ति को दुर्गन्ध का आभास
होना बन्द हो जाता है जबकि बाहर से आने वाला व्यक्ति उस दुर्गन्ध से परेशान होकर
बाहर भागना चाहता है | मुझे यह कहने में बिल्कुल भी संकोच नहीं कि judiciary
नाम की संस्था देश में सर्वाधिक दुर्गन्ध भरी संस्था है |
तीन चार साल से न्यायालय के संपर्क में आने पर और mediation का कटु अनुभव भी आपसे share करना आवश्यक है ताकि आप इस सम्बन्ध में अपने
positive विचार को सही तरह से implement कर सकें | किसी भी बदलाव के लिए
इच्छा शक्ति का होना भी अनिवार्य है और उसका एक अच्छा उदाहरण स्व. श्री T. N. शेषन जी ने दिया
जिन्होंने बिना नया क़ानून बनवाये अथवा कानून में बिना कोई बदलाव के और कानून के
दायरे में रहकर वह सब कुछ किया जिसके लिए आम जन प्रतीक्षा कर रहा था | इसीलिये आज भी किसी भी
व्यक्ति से 2 भूतपूर्व मुख्य चुनाव
आयुक्त का नाम पूंछने पर अवश्य ही एक नाम स्व. श्री T. N. शेषन जी का होगा | क्या ऐसा भूतपूर्व
मुख्य न्यायाधीश के सम्बन्ध में संभव है? आपसे बहुत अपेक्षाएं हैं |
सर्वोच्च न्यायालय में 39940 वर्ष 2018 के संदर्भ में आवेदिका की प्रार्थना पर न्यायालय ने mediation का फ़ैसला दिया | Mediator Ms सुषमा मनचंदा द्वारा केस पढ़ना तो दूर उनको
धारा तक नहीं पता थी | उन्होंने कुछ भी सुनने से इंकार किया | आवेदिका द्वारा मांगे गए 50 लाख रूपये की बात हमें बतायी | हमने देने से इंकार किया | mediator ने कोई भी मिनट बनाने से इंकार किया | दूसरी मीटिंग में आवेदिका ने वापिस आने का ऑफर दिया जिसे अनावेदक मेरे पुत्र
ने मना किया | Mediator ने पुनः कोई भी मिनट बनाने से इंकार किया | तीसरी मीटिंग में आवेदिका ने 80 लाख मांग लिए | Mediator ने पुनः कोई भी मिनट बनाने से इंकार किया | हमने देने से इंकार किया | Mediation पूरा हुआ, हमें तीन बार पुणे से
दिल्ली जाना पड़ा | समय और पैसे की बर्बादी हुई उसी तरह जिस तरह कोर्ट बिना कोई काम किये सालों
साल सिर्फ तारीखें देती हैं और हमारा पैसा व समय बर्बाद करती हैं | शायद मैं mediator होता तो इतने ही समय
में दोनों की बात सुनकर एक मीटिंग में कोई समाधान निकालने का प्रयत्न करता और मिनट
भी बनाता जो आगे काम आते लेकिन mediator तो दलाल बनकर बैठी थी | वकील की भी लार टपक रही थी |
न्यायालय में क्या रिपोर्ट सबमिट हुई हमें पता ही नहीं चला | जज श्री अरुण मिश्रा
जी और श्री नवीन सिन्हा जी ने हमारे वकील से बिना एक शब्द सुने caveat लगे होने के बावजूद
आवेदिका के पक्ष में फैसला दे दिया | सर्वोच्च न्यायालय को अपने अधिकारों की इतनी चिंता है कि प्रेस कांफ्रेंस कर
चार जज आम आदमी से न्याय की अपेक्षा करतें हैं | असंवैधानिक कॉलेजियम सिस्टम से अपनी न्युक्ति करते हैं और हमारे मौलिक अधिकार
का हनन कर फैसला देते हैं |
अब केस पुणे से भोपाल ट्रांसफर हो गया | ट्रांसफर फाइल आपके ऑफिस ने कछुये की पीठ पर रख दी जो 6 माह बाद भोपाल पहुंची
जबकि स्पीड पोस्ट 72 घंटे में पहुँचती है | आपको जानकर आश्चर्य होगा कि मुझे अपने वकील की मार्फ़त केस की धारा और स्टेटस
के बारे में बताना पड़ा जिसे पढ़ने में इतना ही समय लगना था जितनी देर हमें वहां खड़े
रहना था | जज काउंसलिंग/ mediation
पर अड़े रहे हमारे यह बताने और डॉक्यूमेंट दिखाने के बावजूद कि एक प्राइवेट कॉउंसलर द्वारा पुणे
में काउंसलिंग की गयी और अब इस केस की अनावेदिका काउंसलिंग से भाग गयी व सर्वोच्च
न्यायालय का तथाकथित मेडिएशन भी असफल रहा | आवेदक मेरा पुत्र जो
जर्मनी में था एक एफिडेविट द्वारा काउंसलिंग/ मेडिएशन की अनिच्छा जताई | वकील ने बताया कि यदि आवेदक अगली तारीख पर काउंसलिंग के लिए उपलब्द्ध नहीं
होता है तो जज केस ख़ारिज कर देंगें | मुझे रामपुर उ. प्र. से भोपाल
काउंसलिंग/ मेडिएशन के लिए तीन बार जाना पड़ा जिसका नतीजा भी शून्य रहा | पहली बार तारीख दी गयी | दूसरी बार अनावेदिका ने ना आने का प्रार्थना पत्र दे
दिया जिसका उद्देश्य हमें परेशान करना ही था क्योंकि वह तो भोपाल की रहने वाली है | मीडिएटर निर्धारित समय से पूर्व न्यायालय परिसर छोड़कर चली गयी और फ़ोन करने पर
भी आने से इंकार किया | मेरा आवेदक पुत्र जर्मनी में शाम
पांच बजे तक छुट्टी लेकर on-line काउंसलिंग का इंतज़ार करता रहा | जज साहब छुट्टी पर थे | मेरी ज़िद की वजह से हमारे वकील को एक प्रार्थना पत्र तैयार कर दूसरी भली जज
महोदया से endorse कराना पड़ा | मैने वकील से कहा अब
केस ख़ारिज कराकर दिखाओ | तीसरी तारीख पर भी अनावेदिका नहीं आयी और मेरे कड़े रुख के चलते उसे आना ही पड़ा
| दो मिनट की काउंसलिंग
की औपचारिकता पूर्ण हुई | मिनट बनाये गए | मैने हस्ताक्षर से पूर्व पढ़ने की इच्छा जताई | कौंसिलर ने मुझे ऐसे देखा जैसे मैने उसकी भैंस खोल ली हो | मुझे न्यायालय के इस
कटु अनुभव से हर रोज़ निर्भया की माँ के आँसू याद आते हैं |
उपरोक्त mediation procedure को क्या आप ठीक मानते हैं जो सिर्फ औपचारिकता ही है और समय व पैसे की बर्बादी
के साथ साथ परेशानी और कष्ट का कारण | लम्बे खिचते न्यायायिक प्रक्रिया में खाज के साथ खुजली भी |
भवदीय
सुबोध अग्रवाल
307 पुरानी आवास विकास कालोनी
सिविल लाइन्स
रामपुर उ. प्र. 244901
मोबाइल: 9837100538
प्रतिलिपि: 1- माननीय राष्ट्रपति भारत सरकार 2- माननीय उपराष्ट्रपति भारत सरकार
3- माननीय अध्यक्ष लोकसभा 4- माननीय प्रधान मंत्री भारत सरकार
5- माननीय कानून और
न्याय मंत्री
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