कृपया
youtube वीडियो "अपना अपना सोच" पर भी मेरे विचार जाने | यह पत्र
सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Grievance Management 10478/SCI/PIL (E)/2020
में रजिस्टर्ड |
सेवा में,
दिनांक: 19-11-2019
मुख्य न्यायाधीश
सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली
विषय: न्यायालय नहीं फ़ैसला गृह
महोदय,
न्यायालयों का नाम बदलने की प्रक्रिया अब शुरू हो
जानी चाहिए क्योंकि न्यायालयों में न्याय के अलावा बाकी सब कुछ होता है | वकीलों ने दुकानें खोल
रखी हैं |
उनके मुंशियों को ताउम्र बिना मेहनत के मोटी कमाई का साधन मिल जाता है | आम आदमी के साथ उस दिन
अन्याय शुरू हो जाता है जिस दिन वह न्याय का मंदिर कहे जानी वाली इमारत के दर्शन
करता है |
न्यायालय खुद इस बात का गवाह है कि वह फैसले देता है न्याय नहीं | जज अपनी मर्जी का मालिक है जो चाहे लिखे जो चाहे बोले | वैसे भी आप पायेंगें
कि कोई भी बात हो उसका justification लोग ढूंढ लेते हैं | लोगों द्वारा हथियार उठाने को भी यह कहकर justify किया जाता है कि उसके साथ ज़ुल्म हुआ इसलिए उसने
हथियार उठा लिया | दूसरी ओर एक समुदाय की इस दलील को भी फ़ीका करने की कोशिश की जाती है कि इस समुदाय के लोगों की सामूहिक हत्या हुयी, उनकी बहू बेटियों के
साथ बलात्कार हुआ, धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर किया गया, उनके घर जला दिए गए, बेघर होकर अपने ही देश
में शरणार्थी बनकर रह रहे इन लोगों ने हथियार नहीं उठाये | यह भी समझना आवश्यक है कि यह विश्व में अकेला उदाहरण जब कोई अपने ही देश में शरणार्थी बनकर
रह रहा हो और अनेकों बार स्वयं संज्ञान लेने वाले सर्वोच्च न्यायालय ने भी परवाह नहीं की |
न्यायालयों में सिर्फ फ़ैसले होते हैं न्याय
नहीं |
फैसला हमेशा बल, बुद्धि, धन या प्रभाव से अधिक समर्थ के पक्ष में होता है यह एक प्राकृतिक नियम है, खेल का मैदान हो या
युद्ध भूमि, व्यापार हो या राजनीति, कुश्ती हो या न्यायालय | जिसका दांव भारी होगा उसके पक्ष में फ़ैसला होगा | सत्य की जीत होती है
यह तो सत्य हो ही नहीं सकता क्योंकि सत्य समय और परिस्थितियों से प्रभावित नहीं
होता |अपरिवर्तनीय होता है | न्यायालय कहे जानी
वाली इमारत में तो यह कितनी ही बार उलट पुलट होता है | न्याय की कुर्सी पर
बैठने वाला व्यक्ति पूर्वाग्रहों से अछूता नहीं रह पाता | उसका लालन पालन, उसका अध्ययन, उसकी प्रतिबद्धिताएं, उसके जीवन में पूर्व में घटित घटनाएं उसके न्याय करने की प्रवृति में बाधक
बनती हैं |
क्यों ना न्यायालयों को फ़ैसला गृह की संज्ञा दी जाए ? कम से कम व्यक्ति यह
सोचकर जाएगा कि वह न्याय के लिए नहीं फैसले के लिए जा रहा है | आर्थिक और गैरआर्थिक
भ्रष्टाचार व तानाशाही में भारत का कोई संस्थान न्यायालयों की बराबरी नहीं कर सकता
| संविधान और विधायिका
को धता बताकर अपनी नियुक्ति करना, बिना सुने फैसला देना और जब चाहे जिसको धमकाने की यह प्रवृति स्वयं भगवान से
ऊपर माने वाले की ही हो सकती है | उदाहरणतः मौलिक अधिकार का हरण कर
पेटिशन 39940
वर्ष 2018 में कैविएट लगे होने के बावजूद बिना वकील को सुने 5 सेकंड में फैसला देना
और झूंठ लिखना कि " Having heard the
learned councel for the parties and gone through ". डंके की चोट पर आज भी कुर्सी पर डटे रहना और यह मानना कि तुमसे कुछ उखाड़ा जाये
तो उखाड़ लो की उक्ति चरितार्थ करना |
भवदीय,
सुबोध कुमार अग्रवाल
307 पुरानी आवास विकास कॉलोनी
सिविल लाइन्स रामपुर उ. प्र. 244901
मोबाइल: 9837100538
प्रतिलिपि: 1- माननीय राष्ट्रपति 2- माननीय उपराष्ट्रपति
3- माननीय अध्यक्ष लोकसभा 4- माननीय प्रधान मंत्री
5- माननीय कानून और न्याय मंत्री
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