Wednesday, 3 June 2020

न्यायालय में व्याप्त आर्थिक/ गैर आर्थिक भ्रष्टाचार, निष्क्रियता, निरंकुशता और अहंकार part II

कृपया youtube वीडियो  "अपना अपना सोच" पर भी मेरे विचार जाने | यह पत्र सर्वोच्च न्यायालय द्वारा Grievance Management 807/SCI/PIL (E)/2020 में रजिस्टर्ड |

सेवा में ,                                                                                              दिनांक :  28 -06 -2019
माननीय कानून और न्याय मंत्री,
भारत सरकार
नई दिल्ली

विषय: न्यायालय में व्याप्त आर्थिक/ गैर आर्थिक भ्रष्टाचार, निष्क्रियता, निरंकुशता और अहंकार के सम्बन्ध में

आदरणीय रविशंकर प्रसाद जी,

मै आपका हृदय से प्रशंसक हूँ, मुझे और अधिक शब्दों की आवश्यकता नहीं |  न्यायालय में सुधार के बिना भारत की समस्याओ का समाधान नहीं | यह कार्य अग्निपथ पर चलने के सामान है | राजनैतिज्ञ क्या, मीडिया और पत्रकार भी इस पर हल्की फुल्की चर्चा से अपने कर्तव्य का निर्वाह लेते हैं | मैं अपने अधिवक्ता मित्रों से इसकी चर्चा करता हूँ तो उनके अंदर न्यायालय अवमानना का डर शाब्दिक रूप में प्रकट होता है | एक तरफ मोदी सरकार भ्रष्टाचार के ऊपर प्रहार के रूप में वित्त अधिकारियों को दो किस्तों में चलता कर देती है और दूसरी ओर मेरे द्वारा लिखे पत्र (registration no. PMOPG/D/2019/0190945) का पहले संज्ञान लेते हैं लेकिन फिर न्यायालय से सम्बंधित बताकर बंद कर देते हैं | अपने साथ हुए अन्याय के लिए दोषी को कटघरे में खड़ा करना क्या न्यायालय के कार्य में बाधा पहुँचाना या अवमानना हो सकता है ? मै तो यदि अवमानना साबित होती है तो सज़ा के लिए तैयार हूँ | इस बहुत ही मामूली केस में (केस स. 39940 वर्ष 2018, सर्वोच्च न्यायालय) न्यायालय से कोई भी राहत की न तो मुझे अब दरकार है और न ही उम्मीद, लेकिन मन में अन्याय के प्रति उठ रही पीढ़ा का क्या? क्या शपथ लेकर कोई जज किसी अधिवक्ता से एक शब्द भी सुनने से इन्कार कर, फैसला सुनाने का अपराध कर सकता है जबकि कवियेट भी लगी हो ? क्या किसी जज के खिलाफ कोई भी कार्यवाही के लिए ढेर सारे भ्रष्टाचार के सबूत ही चाहिए ? वह अन्याय करता रहे और रिटायर हो जाये, सभी मूक दर्शक  बने रहें | अब उच्चतम न्यायालय से लेकर निचली अदालत के बारे में चर्चा कर लें जिसके बारे में आप पूर्णता अवगत होंगे | पैसे की ईमानदारी  थोड़ा सा ही लाभ समाज को पहुँचाती है लेकिन कार्य के प्रति ईमानदारी समाज को सम्पूर्ण लाभ पहुँचाती है | कहाँ खो गया मुंशी प्रेमचंद का पंच परमेश्वर ?
1- सर्व सम्मत्ति से लोक सभा व राज्य सभा में पास बिल को निरस्त कर असंवैधानिक तरीके से अपनी नियुक्ति करना | क्यों नहीं यह बिल दोबारा लाया जाए और अब यदि निरस्त करने की हिमाकत करें तो सभी के ऊपर महाअभियोग चलाया जाये?
2- सर्वोच्च न्यायालय के चार जजों द्वारा बन्दर बाट के लिए प्रेस कांफ्रेंस करना और फिर बंद कमरे में बन्दर बाट का निपटारा कर लेना |
3- मुख्य न्यायाधीश का स्वयं के ऊपर लगे झूंठे आरोपों का चार दिनों में मुक्त हो जाना जिसके लिए आम आदमी की पूरी ज़िंदगी खराब हो जाती है क्योंकि आप न्याय के प्रति गंभीर नहीं हैं |
4- जस्टिस कर्णन को अवमानना के लिए सज़ा देना सही या गलत छोड़ देते हैं लेकिन उनके द्वारा लिखे भ्रष्टाचार से सम्बंधित पत्र का क्या? मीडिया पर जस्टिस कर्णन केस में रिपोर्टिंग पर प्रतिबन्ध लगाना ? मीडिया की स्वतंत्रता के लिए आप फैसला देते हैं और स्वयं  समीक्षा से संरक्षण चाहते हैं | क्या किसी व्यक्ति, पद अथवा संस्था विशेष को व्यंग्य, कार्टून, समीक्षा आदि से छूट होनी चाहिए ? यदि ऐसा होगा तो आज नहीं तो कल दुरूपयोग निश्चित है |
5- कुछ वर्ष पूर्व एक मुख्य न्यायाधीश द्वारा आँसू बहाना जिसे समाज ने आंसू पोंछने का अवसर दिया   यह आंसू कम से कम न्याय के लिए तरस्ते दरिद्र नारायण के लिए तो नहीं थे |
6- निचली अदालतों की अगर बात करें तो तारीख के लिए जज के सामने ही पैसे लेना, सम्मान जारी करने के पैसे लेना, हर छोटे बड़े काम के पैसे लेना, उस दिन के भी पैसे लेना जिस दिन स्ट्राइक हो या कोर्ट किसी भी कारण से ना लगे | सम्मन तो बार बार पैसे देने पर भी तामील नहीं होते |
7- आये दिन की स्ट्राइक और पहले से पता होने पर कि लोकल हॉलिडे की छुटटी होगी फिर भी उस दिन की तारीख देना | चेक बाउंस होने के मेरे एक केस में 30 महीने से ज़्यादा के बाद भी इन कारणों से अभियुक्त के बयान तक नहीं हो पाना | मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखने पर उनके पत्र का हास्यास्पद उत्तर संलग्न है जिसमे उन्होंने उच्च न्यायालय को लिखने की सलाह दी है जो उनके आधीन कार्य करता है और यह पत्र वह उन्हें भेज सकते थे, प्रतिलिपि हमें | उच्च न्यायालय की निद्रा टूटेगी शक है क्योकि उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को हटाने के लिए तो वह स्वयं चिट्ठी लिख रहे हैं | 
8- निचली अदालतों में न्यायाधीशों का 2-3 घंटे बैठना, आए दिन की छुट्टी, बच्चों के स्कूल की तरह गर्मी सर्दियों की छुट्टी, आए दिन की स्ट्राइक | कुल 4-6 मिनट सुने जाने वाले केस में 4-6 साल से ज़्यादा लगना | सभी न्यायालायों में अंदर व बाहर CCTV कैमरे लगाने से भ्रष्टाचार पूर्णता तो नहीं लेकिन कुछ तो रुकेगा | वकील का मुंशी ही आज भी पैसे अंदर पहुंचाता है लेकिन काम कैसे और कितने घंटे होता है पता चल सकेगा |
9-पहले राजा चंद मिनटों में न्याय करता था उसका आंकलन भी न्यायिक प्रणाली से होता था लेकिन आज न्यायालय की कोई जवाब देही नहीं | पहले भी किसी किसी के साथ अन्याय होता होगा लेकिन आज तो 100% अन्याय होता है उसके साथ भी, जो जीतता है | अन्याय की यह प्रक्रिया पहले दिन से शुरू हो जाती है | जाए तो कहाँ जाए,  अमेरिका या जर्मनी के न्यायालय ?
10- CPA (Consumer Protection Act) में क्यों नहीं न्यायालय को आना चाहिए? डॉक्टर जो सभी मरीज़ो का तुरंत इलाज करता है और हज़ारों मरीज़ों की ना सिर्फ जान बचाता है बल्कि उनकी दुआयों का पुण्य कमाता है, उससे अनजाने में कोई गलती भी हो सकती है | ब्रह्माण्ड में कुछ भी आदर्श नहीं है, अंतरिक्ष में भी 100% वैक्यूम नहीं है | जबकि हमारे न्यायालय हर रोज़ जान बूझकर ना सिर्फ लोगों को कष्ट पहुंचाते हैं बल्कि उनके जीवन का उत्साह छीनने का घोर पाप भी करते हैं | उनके मन मस्तिष्क को घोर पीढ़ा पहुंचाते हैं | न्यायालय चाहे तो एक वर्ष के अंदर समूचे भारत के पेंडिंग केस इसी man power से निपटा सकते हैं | आपसे अनुरोध है कि जवाब देही बिल लाएं | 

भवदीय


सुबोध कुमार अग्रवाल
307 पुरानी आवास विकास कॉलोनी
सिविल लाइन्स, रामपुर उ. प्र. 244901
मोबाइल : 9837100538

संलग्न : 1- उच्चतम न्यायालय के पत्र की कॉपी

2-न्यायायिक व्यवस्था में सुधार बिना भारत की समस्याओं का समाधान नहीं (blog copy)

3- कार्य के प्रति ईमानदारी (blog copy)

 

No comments:

Post a Comment