Sunday, 13 October 2019

सभ्रांत परिवारों की महिलाओं का नाटक

पढ़ी लिखी और दूसरी ऐसी महिलायें जो दबी कुचली नहीं हैं वह अपने महिला होने का वास्ता देकर  समाज की सहानुभूति अर्जित करना चाहती हैं और यही वह महिलायें हैं जो पुरुषों के सिर पर तबला बजा रही हैं | दबी कुचली महिलायें तो बेचारी आज भी अपनी दुर्दशा पर रो रही हैं | यही वह महिलायें हैं जो महिला संगठन के नाम पर प्रदर्शन कर रही हैं जबकि जो दर्द समझ रही हैं वह तो चुपचाप अंदर ही अंदर अपना कार्य कर दबी कुचली महिलाओं को शक्ति प्रदान कर रही हैं | वह मुखर भी नहीं हैं | सहानुभूति की अपील भी नहीं करती हैं | यदि सच कहूँ तो इन मुखर होती महिलाओं को इसमें शामिल कर मुस्लिम तुष्टिकरण की तरह महिला तुष्टिकरण का एक खेल खेला जा रहा है | अब समय आ गया है कि हिन्दू - मुस्लिम, महिला - पुरुष से हटकर सिर्फ आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक आधार पर भी समाज को दो भागों में बटा देखने की आवश्यकता है, एक सभ्रांत और दूसरा दबे कुचले परिवार | इसके लिए रेवड़ियाँ बाटने वाले रेजिस्ट्रेशन की आवश्यक्ता नहीं |

Sunday, 29 September 2019

न्यायालयों का इन्साफ


                             
मैं हैरान होता हूँ जब सुनता हूँ कि न्यायालयों में इन्साफ होता है | न्यायालय में सत्य की जीत होती है | सत्य एक होता है और समय के साथ अपरवर्तनीय है | यदि ऐसा है तो कैसे निचली अदालत से उच्चतम न्यायालय तक पहुँचते पहुँचते फैसले उलट पुलट हो जाते हैं ?  सभी कहते हैं सत्य की जीत हुई है | यह सत्य कैसे समय के साथ परिवर्तित हो जाता है ? सभी अपनी बुद्धि और विवेक के आधार पर न्यायिक फ़ैसला देते हैं ऐसा कहा जाता है | क्या यह सच है कि न्यायालय में दिए गए फैसलों में व्यक्तिगत निष्ठा प्रतिबद्धता पूर्वाग्रह का स्थान नहीं होता ? यदि हाँ तो फिर बैंचों के गठन के समय हिंदू मुस्लिम ईसाई का होना अथवा अलग अलग जाति समुदायों के जजों को बैंच में शामिल करने का क्या औचित्य है ? क्या न्यायिक व्यवस्था को किसी व्यक्ति या समूह का बंधक बनाकर रखा जा सकता है जो स्वयं इसी समाज की विकृति का  हिस्सा है जहां अहिंसा धर्म सम्भाव वैचारिकता के साथ साथ हिंसा भ्रष्टाचार अधर्म भी निवास करता है | ऐसा विचार काल्पनिक नहीं है बल्कि उस वास्तविकता पर आधारित है जो हमें आपातकाल से आज तक अनेकों बार देखने को मिला | मनमाने फैसलों को मानने को यह समाज मजबूर है | अब पाठक को यह सवाल दागने का अधिकार है कि मुझसे पूंछे कि क्या किया जाए ? कहाँ से और कैसे ऐसे व्यक्तियों का चयन हो तो कर्त्तव्य निष्ठा प्रतिबद्धता से कार्य करें और जो मुंशी प्रेमचंद के पंच परमेश्वर का एक पात्र हो ?
मेरा उत्तर दो वाक्य का है | पहला : हम स्वीकार करें कि बीमारी है तभी बीमारी इलाज हो सकता है |
दूसरा: न्यायालयों और न्यायधीशों को भगवान ऊपर का दर्जा ना दिया जाए | उनके हर कृत और फैसले पर सवाल उठाए जाएं | उनके कार्यों और फैसलों की समीक्षा का समाज को अधिकार हो और RTI एक्ट उन पर भी लागू किया जाए | उनकी जवाब देही तय हो |

जिस देश में राम कृष्ण को सुबह पूजा की जाती हो और शाम को समीक्षा की जाती हो उस देश में न्यायाधीशों को भगवान से ऊपर का दर्जा देना समझ से परे है और यही अन्याय की जड़ है | समूचे राष्ट्र के प्रतिनिधियों द्वारा बनाये कानून को अपने व्यक्तिगत हित के लिए निरस्त करना, एक व्यक्ति या 3-11 व्यक्तियों के समूह को किसी कानून के प्रावधान पर पुनः विचार करने का आग्रह करना तो शायद न्यायसंगत हो भी सकता है लेकिन करोड़ों लोगों द्वारा चुने प्रतिनिधियों द्वारा सर्व सम्मति अथवा बहुमत के आधार पर बनाए कानून को निरस्त कर देना बहुत चिंता का विषय है | न्यायाधीशों में सर्व सहमति भी कभी कभी ही दिखाई देती है | इसीलिये कहना है कि किसी एक व्यक्ति अथवा समूह के सोच से समस्त समाज को बंधक बनाना उचित नहीं |

Wednesday, 17 July 2019

कार्य के प्रति ईमानदारी- 2


आम तौर से हम पैसे की ईमानदारी को पूरी ईमानदारी मानते हैं और व्यक्ति विशेष को पूरे सम्मान का अधिकारी मानते है | ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि समाज में ऐसे लोग कम ही दिखाई देते हैं | यह लोग विशेष सम्मान के अधिकारी हैं भी | ईमानदारी को और अधिक परिभाषित करें तो यह दो तरह की होती है एक तो पैसे की ईमानदारी और दूसरी वैचारिक ईमानदारी | वैचारिक ईमानदारी का ही हिस्सा है कार्य के प्रति ईमानदारी | कार्य के प्रति ईमानदारी दूसरा बहुत ही महत्व पूर्ण पहलू है | पैसे की ईमानदारी से देश व समाज का कुछ भला तो होता ही है लेकिन यह यह आत्म संतुष्टि भी देती है | जो लोग आत्म संतुष्टि से संतोष नहीं कर पाते, फिसलकर बईमानी की ओर चले जाते हैं | पैसे से ईमानदार, वैचारिक ईमानदारी भी रखता हो, यह ज़रूरी नहीं लेकिन वैचारिक ईमानदार व्यक्ति के लिए पैसे की ईमानदारी अनिवार्य शर्त है | ज़्यादातर व्यक्तिगत ईमानदारी रखने वाले लोग कार्य के प्रति ईमानदार होते हैं लेकिन सभी नहीं | इसमें यदि राजनीतिज्ञों और व्यापारियों को शामिल कर लें तो यह संख्या और कम हो जाएगी | आम तौर पर लोग मानते हैं कि राजनीति और व्यापार में समझोते करने होतें हैं | उन समझोतों को कुछ लोग बईमानी नहीं मानते | व्यक्तिगत ईमानदारी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाती है लेकिन कार्य के प्रति ईमानदारी पूरे समाज व देश को लाभ पहुंचाती है | उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी से चंद रुपयों का लाभ ही समाज को मिल पाता है लेकिन उनका एक फैसला हमेशा के किये समाज को लाभ अथवा हानि पहुंचाता है | उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति द्वारा 130 करोड़ की बेईमानी करने से प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक रूपये की बेईमानी होती है लेकिन ईमानदारी से न किये गए काम से व्यक्ति के जीवन का सुख चैन और उल्लास की चोरी होती है | ऐसा न्यायालय प्रतिदिन करता है | न्यायालय में अन्याय उस दिन से शुरू हो जाता है जिस दिन वह न्यायालय का रुख करता है | इसीलिये कहा जाता है जो जीता वह हारा और जो हारा वह मरा | इस बात को अच्छी तरह समझने के लिए आप उच्चतम न्यायालय का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ अनेको ईमानदार न्यायाधीश हुए लेकिन बहुत ही कम जिन्होंने कार्य और समाज के प्रति निष्ठा रखी व सरकारों के प्रति नहीं | न्यायालयों में अनेकों पैसे से ईमानदार न्यायधीश हुए लेकिन उनका झुकाव शासित अथवा विरोधी राजनैतिक पार्टी के साथ होने की वजह से देश और समाज को वह नहीं दे पाए, जिसकी आवश्यकता थी | न्यायाधीशों के पास समाज के उत्थान ने लिए बहुत गुंजाइश होने के बावजूद, उन्होंने इस्तेमाल में कंजूसी दिखाई | न्यायधीशों की निष्ठा यदि सिर्फ अपने कार्य के प्रति होती तो वह राजनैतिज्ञों को उनकी मनमानी और भ्रष्टाचार से रोक सकते थे | प्रजातंत्र के दो स्तंभ न्यायालय और मीडिया यदि अपना कार्य ईमानदारी से करें तो राजनैतिज्ञ और प्रशासनिक तंत्र की हिम्मत नहीं जो आर्थिक या गैर आर्थिक भ्रष्टाचार कर सकें |

अनेको उदहारण है जब न्यायालयों से लोगों की अपेक्षाएं जुड़ी थीं जैसे कैम्पाकोला सोसाइटी केस | जिनके फ्लैट खाली कराकर तोड़ दिए गए उनको तो ज़रुरत से ज़्यादा सजा मिली लेकिन उन भ्रष्ट आफिसर्स और राज नेताओं का क्या, जिनके कारण यह सब हुआ? लेकिन ऐसे बहुत से केस जो सामाजिक और राजनैतिक सरोकार के रहे और सालों साल उनका नंबर नहीं आया या कभी भी नहीं आया और वह अपनी मौत मर गए | 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही मोदी जी द्वारा दागी सांसदों के केस की जल्दी सुनवाई को उच्चतम न्यायालय द्वारा नकार देना | कई बार साधारण, अनावश्यक केस को एक दो दिन में ही सुन लिया जाना | विवेक के नाम पर अजीब ओ गरीब फैसलों का दे दिया जाना | अनावश्यक रूप से व्यक्तिगत टिप्पणी किया जाना, कई बार डिकटेटरशिप का आभास कराते हैं | स्वयं अपनी नियुक्ति के लिए कोलोजियम सिस्टम बना लिया जाना जो विश्व में कही भी लागू नहीं | सभी लोग कहते हैं कि हमें न्यायालय में विश्वास है लेकिन न्यायालय को संविधान में कितना विश्वास है यह कहना कठिन है | न्यायालय ना सिर्फ अपनी समीक्षा से बचता है बल्कि किसी को अपने उपर टिप्पणी को अपना अपमान मानता है | न्यायाधीश न्युक्ति की दलील तो देते हैं लेकिन दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पास बिल को निरस्त कर देते हैं | कहा जाता है सत्य एक होता है और जो समय और परिस्थितियों के साथ बदलता नहीं | न्यायालयों से अगर सत्य की वाणी उद्घोषित होती है तो फिर बेंच के दो न्यायधीशों की राय अलग कैसे हो जाती है | 1975 में आपातकाल के समय बहुत से न्यायाधीशों ने कार्य के प्रति ईमानदारी नहीं दिखाई और देश को ना सिर्फ आपातकाल में धकेलने का काम किया बल्कि आम आदमी के अधिकारों के हनन में सहयोग दिया |  बहुत से उनके साथी न्यायाधीश आज भी उन फैसलों को गलत और अपने निजी स्वार्थ की वजह मानते हैं | हमारे देश में लोग सुबह राम कृष्ण को पूजते है और शाम को उनके कार्यों की समीक्षा करते है लेकिन न्यायालय हो या मीडिया आलोचना पचा नहीं पाते | माडिया और न्यायालयों को उनकी आलोचना पगला देती है और वह किसी हद तक जाने को तैयार रहते हैं | वैचारिक भ्रष्टाचार से घिरे राजनीतिज्ञों की तो बात ही क्या की जाए | कार्य के प्रति ईमानदार दो व्यक्तियों के नाम तुरन्त ही मस्तिष्क में आते हैं, होंगे बहुत सारे और सभी क्षेत्रों में | भूतपूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी और भूतपूर्व राष्ट्रपति ए. पी. जे. अबुल कलाम जी | वैचारिक ईमानदारी अपने आस पास रहने वालों में भी देखी जा सकती है | तटस्थ रहकर फैसले लेना स्वयं और समाज देश के लिए हितकारी होता है | मुंशी प्रेमचंद की पञ्च परमेश्वर बेहतरीन उदाहरण है |
भारत के इतिहास में झांके तो पायेंगें पहले राजा न्याय करता था | राजा की प्रतिष्ठा की समीक्षा में न्याय व्यवस्था का मुख्य स्थान होता था | राजा कैसा न्याय करता था उसकी प्रतिक्रियायें इतिहास में दर्ज हैं | राजा राम हों या जहांगीर | आज न्याय प्रक्रिया भारत के राजा यानि प्रधान मंत्री के पास नहीं है लेकिन न्यायायिक प्रक्रिया पर प्रहार का शिकार वही बनता है | न्यायालय की कोई जवाब देही नहीं और वह साफ़ बाहर निकल आता है | शिथिल न्यायायिक प्रक्रिया और निर्णयों का न्यायालय की साख और न्यायाधीश के करियर पर कोई फर्क नहीं पड़ता | न्यायालय ना तो राजा के प्रति और ना ही प्रजा प्रति जवाब देह है | वह तो उस ब्रिटिश राजा और अब महारानी की तरह है जो कभी कोई गलती कर ही नहीं सकता | यही भारत की समस्याओं की जड़ है | न्यायालय में सुधार के लिए कोई तैयार नहीं | जजों की नियुक्ति हमेशा ही सवाल बना हुआ है |
चैक बाउंस होने जैसे मामूली केस में न्यायाधीश अपने कुल 5 मिनट भी नहीं देगा जिसके लिए वह 5 वर्ष लगाएगा, 32 माह गुज़र चुके हैं | न्यायालय में व्याप्त भष्टाचार और देरी के लिए लिखे जाने पर सर्वोच्च न्यायालय  ने उच्च न्यायालय में जाने की सलाह देकर धारा 235 का हवाला दिया लेकिन कॉलेजियम सिस्टम से नियुक्ति की धारा का हम भारतीय नागरिकों को आज तक पता नहीं है | पेटिशन न. 39940 वर्ष 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय की मूल भावना के विरुद्ध बिना विपक्ष को बिना सुने फैसला सुना दिया जबकि कैविएट लगी थी और वकील मौजूद था | वकील ने बोलना चाहा लेकिन जज ने एक वाक्य भी बोलने नहीं दिया और पेटिशनर के पक्ष में फैसला देने  में 5 सेकंड भी नहीं लिए | इस सम्बन्ध में मुख्य न्यायाधीश को लिखने पर उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया | आश्चर्य जनक तरीके से मोदी जी ने इसे अदालत से जुड़ा माना जबकि यह मौलिक अधिकार से जुड़ा मामला है और मै इसे जुडिशियल डिक्टेटरशिप की संज्ञा देता हूँ जिसके विरुद्ध मैं भारतीय नागरिकों को लड़ाई लड़ने के लिए आवाहन करता हूँ |

Monday, 22 April 2019

यह कैसा मीडिया ?

लोक सभा में नाम स्पीकर लेकिन बोलते कुछ नहीं सिबाय " शांत हो जाइये " " बैठ जाइये " आदि के | मीडिया में नाम एंकर लेकिन बोलते ही रहते हैं शुरू से आखिर तक | कुल समय का आधे से ज़्यादा समय खुद खा जाते हैं फिर कहते हैं समय की कमी है | अरे भाई इतना ही शौक है बोलने का तो मेज के दूसरी तरफ औरों के साथ बैठिये | मेहमान की बात को ऐसे समझाते हैं जैसे अकेला वही समझदार और बाकी सब श्रोता बेवकूफ | सबको सर्टिफिकेट बाटते हैं और स्वयं के लिए कहते हैं कि हमें आपके सर्टिफिकेट की ज़रुरत नहीं |  एक एंकर कहने लगा मुझे सीना नापने के लिए इंचीटेप लेकर बैठना होगा | मैने मेल किया कि साथ में दूध और पानी की बाल्टी लेकर भी बैठा करो क्योंकि रोज़ आप " दूध का दूध पानी का पानी " बोलते हो | नेताओं को दोष देते हैं जातिवादी राजनीति के लिए और आकड़ें स्वयं प्रस्तुत करते हैं | स्वयं को देश  समाज से ऊपर न्यायवादी बताते हैं |
" देश पूंछ रहा है " जैसे वाक्य बोलते हैं जबकि घटना तो अभी अभी घटी है और देश को अभी पता भी नहीं है | अपने सवालों को देश के सवाल नाम देकर हल्ला करते रहते हैं जबकि देश से तो पूंछते ही नहीं की सवाल हैं क्या? यदि खाना पूर्ति के लिए माइक कैमरा ले भी गए तो उसे बोलने का मौक़ा ही नहीं देते, जल्दी में रहते हैं |
एक मेहमान बोलता है और दूसरा हस्तक्षेप करता रहता है |  एंकर जानबूझकर चुपचाप बैठा रहता है | शायद स्कूल के समय में उसने इसी तरह की घटिया डिबेट देखी होंगी | डिबेट के बीच में किसी को हाँ हूँ कहने की इज़ाज़त क्यों होनी चाहिए ? क्या इसलिए कि सब्ज़ी मसालेदार होनी चाहिए ? कच्ची सब्ज़ी परोसने की टी. वी. चैनेल की हिम्मत नहीं ? अपने ज़ायके की सब्ज़ी खाने का आपको अधिकार नहीं, रेस्टॉरेंट में उनके ज़ायके की सब्ज़ी खाइये, कच्ची सब्ज़ी तो उपलब्ध नहीं | यदि कच्ची सब्ज़ी चाहिए तो अपने घर पर उगाइये और खुद का चैनल का रजिस्ट्रेशन कराइये |