मोदी जी का स्वक्षता अभियान हर दृष्टि से स्वागत योग्य है | समाज के सभी वर्गों से इसको समर्थन मिला है | इसकी मार्केटिंग भी अच्छी तरह से की जा रही है | सभी पत्रकार, अखवार व न्यूज़ चैनल भरपूर खुशनुदी का परिचय दे रहे हैं | खुशनुदी इसलिए कि हर छोटी बात पर बहस करने वाले, चीरा फाड़ी करनेवाले, कमियां निकालने वाले इस समूह को आजतक बहस कि ज़रुरत महसूस नहीं हुयी | आज तक इसका ब्लूप्रिंट जारी नहीं हुआ है | इसका स्वरुप क्या हो, पैसा कि ज़रुरत है या नहीं, है तो कहाँ से, नहीं तो क्यों नहीं | कौन करे, कैसे करे, कोई चर्चा नहीं | मोदी जी उपदेशक कि भूमिका में हैं और उन्होंने अनेकों उपदेशकों की घोषणा कर दी है | उन्होंने भी अपने हिस्से के उपदेश देकर इतिश्री कर ली है | यदि किसी काम को न कराना हो तो उसका सबसे अच्छा तरीका होता है उसकी ज़िम्मेदारी सबको दे दो जैसे मोदी जी ने पूरे भारत को स्वक्षता अभियान कि ज़िम्मेदारी दे दी है | इसका अर्थ यह नहीं कि मै मोदी जी का विरोधी हूँ | में तो उनके कई कार्यों का प्रशंसक हूँ | उन्हें बैंक एकाउंट खोलने थे या बीमा कराना था या सीधे गैस सब्सिडी पहुचानी थी तो उन्होंने स्वम उस काम को अपने आफिस के द्वारा बहुत कम समय में करा लिया |
हम वापिस स्वक्षता अभियान पर आते हैं | स्वक्षता अभियान के लिए ज़रूरी है कि हम देखें दूसरे देशों में किस तरह इस काम को सफलता पूर्वक कम खर्चे पर किया गया | बहुत ही साधारण व्यवस्था सारे देशों में है | हर थोड़ी दूरी पर ड्रम रखें हैं | उनमे पॉलिथीन के बैग लगें हैं | एक व्यक्ति आता है जिसके पास बहुत से पॉलिथीन बैग हैं | वह भरे पॉलिथीन बैग को बांधकर ड्रम के बगल में रख देता है और नया पॉलिथीन बैग ड्रम में लगा कर आगे बढ़ जाता है | ऐसा करने में उसे एक से दो मिनट लगता है | सैंकड़ो बैग को एक आदमी हैंडल कर सकता है | दूसरा आदमी कुछ देर के बाद अकेले एक छोटा सा मोटर ट्रेलर लेकर आता है और बैग उसमे डाल कर ले जाता है | ऐसे ट्रेलर रोज़ ही रामपुर जैसे छोटे शहर में कूड़ा उठाने के लिए अपने घर के पास देखता हूँ जिस पर चार आदमी फावड़े तशले के साथ कूड़ा उठाते हैं, चारों तरफ बदबू और फर्श पर गंदगी छोड़ने एवं स्वम को बीमारी की दावत देने पर मजबूर हैं | हमें यूरोप सिंगापुर जैसे देशों को छोड़ देना चाहिए जहाँ जगह कम पैसा ज्यादा है | हमारे पास अभी इतनी कम जगह नहीं है बल्कि हमें तो पार्क ग्रीनरी कि ज़रुरत है, इसीलिए वेस्ट मैनेजमेंट के लिए प्लांट लगाने कि ज़रुरत नहीं है | हमें तो हर शहर कस्बे गाँव में एक जगह इस काम के लिए छोड़ देनी है जिस पर कूड़ा एकत्र किया जा सके | ऊँचा पहाड़ी जैसा बना सकते हैं जैसा कि गाज़ियाबाद से दिल्ली जाते हुए बाएं हाथ पर देखा जा सकता है | इसको बाद में पार्क बनाया जा सकता है और पेड़ पोधे लगाये जा सकते हैं |कूड़े के लिए दूसरी जगह दी जा सकती है |
मोदी जी जब कहते हैं कि किसी को सिंगापुर में थूकते देखा है तो मुझे आश्चर्य होता है | यह तो सीधा सीधा 120 करोड़ भारतीयों पर आरोप है | हर समाज में चोर डकैत हत्यारे व बलात्कारी मौजूद हैं तो क्या पूरे समाज को चोर डकैत हत्यारा बलात्कारी मान लिया जाये | मुझे जाति तौर पर घोर आपत्ति, मै क्यों इस आरोप को बर्दाश्त करूं ? यदि आम भारतीय सफाई पसंद नहीं होते तो सिंगापुर में 15 % भारतीय, वहां भी थूकते | यानी दोष व्यवस्था का है भारतीयों का नहीं | आम भारतीय यदि सफाई पसंद नहीं होता तो भारत में माल मेट्रो और एअरपोर्ट पर भी गंदगी करता | आप किसी पार्टी में जाते हैं आपको खाने के बाद गन्दी प्लेट रखनी होती है, ड्रम खोजते हैं और यदि नहीं मिलता तो एक कोने में प्लेट तो टिका देते हैं | कुछ देर बाद वहां प्लेटों का ढेर लग जाता है | इससे सिद्ध होता है कि हमें व्यवस्था चाहिए और व्यवस्था देने कि ज़िम्मेदारी सरकारों कि होती है | कोई भी व्यवस्था पहले दिन से सफल नहीं होती, समय लगता है | कुछ लोग व्यवस्था को तोड़ने में आनंद लेते हैं, उनके लिए सजा का प्रावधान है| आप यदि इस काम को 120 करोड़ भारतीयों पर छोड़ दें तो यह काम 2019 तो क्या 2119 में भी पूरा नहीं होगा जब भारतीय बढ़कर 240 करोड़ हो जायेंगे | मै बचपन से अपने पिता को अपने पैसे से घर के सामने नाली साफ़ कराते, उसपर पानी डालते, कूड़े के ढेर को हर रोज़ उठवाते व चूना डलवाते और आज स्वम यह काम कराते हुए, 60 साल के अनुभव से ऐसा कह सकता हूँ| हर व्यक्ति न तो इतना सोच पाता है और न ही इतना सक्षम होता है |
दूसरा बिंदु है खर्चे व पर्यावरण का | आज भी नगरपालिकाएं और पंचायते इससे ज्यादा खर्च रोज़ फावड़े व परांत का इस्तेमाल कर कूड़ा उठाने के लिए करती हैं | यह कूड़ा सड़ता है, बीमारी फैलती है, उठाने वाले बेचारे गंदगी में यह काम करते हैं | जगह फिर भी गन्दी रह जाती है, बदबू दिन भर बनी रहती है | जिनके घरों के आगे कूड़े के ढेर लगते हैं वह परेशान रहते हैं | पॉलिथीन व उसको लगाने और फेकने का खर्चा निश्चित रूप से आज कूड़ा उठाने व फेकने के तरीके से कम आयेगा | वेस्ट प्लांट की बात अभी हमें सोचनी नहीं है | पॉलिथीन कि जगह दूसरा कुछ इस्तेमाल करने पर पेड़ों का वध करना पड़ेगा | पॉलिथीन जो नालियों में व हवा में उडती फिरती है बहुत थोड़ी जगह में एकत्र हो जाएगी और दो चार एकड़ में दफ्न हो जाएगी, वह एरिया ग्रीन हो जायेगा | उस जगह का पानी आस पास कि ज़मीन से होता हुआ वापिस धरती में पहुँच जायेगा |
अब मुख्य विषय है ड्रम का व पैसे का ? कुछ लोग कहते हैं कि ड्रम लोग उठा कर ले जायेंगे | मै आपको बता दूं किसी भी सरकारी चीज़ कि चोरी तभी होती है जब सरकार चाहती है वर्ना रेलवे का लोहा, सड़क पर प्रोजेक्ट के काम के खम्बे और केबल कोई छूता भी नहीं है | यह अलग बात है आपकी टूटी चप्पल भी उठा कर भाग जाता है| केंद्र सरकार को पंचायतों व नगरपालिकाओं को ड्रम उपलब्ध करने चाहिए | एक शहर या कस्बे में यदि दस हज़ार ड्रम माने जाएँ और प्लास्टिक के बने इस ड्रम को ग्राउट करने तक कुल खर्चा एक हज़ार माना जाये तो हुआ एक करोड़ | ऐसे यदि दस हज़ार शहर कस्बे गाँव माने जाएँ तो सरकार को दस हज़ार करोड़ रुपया चाहिए| पिछले साल गैस सब्सिडी 568 रुपया थी जो आज 163 है यानि क़रीब 400 कम | 100 करोड़ सिलिंडर हर साल बेचे जाते हैं | सब्सिडी पर चालीस हज़ार करोड़ कि बचत हो रही है आयल कंपनियों को | सरकार पिछले सालों में अडतीस हज़ार करोड़ कि सब्सिडी देती आई है |
सरकार को एक बिल पास कर सभी राज्यों में इसे लागू कराना चाहिए | सभी सार्वजनिक जगाहों पार्क, पेट्रोल पंप, डिपार्टमेंटल स्टोर, रिपेयर शॉप, वेंडर, रेस्टोरेंट, होटल, मिठाई कि दूकान, आइसक्रीम पारलर, नाई की दूकान, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, धार्मिक स्थल जैसे मंदिर मस्जिद गुरूद्वारे चर्च आदि के पास रखना अनिवार्य कर देना चाहिए | घरों के आगे कोनों पर भी रखने के लिए नोटिफिकेशन किया जा सकता हैं |