आम तौर से हम पैसे की ईमानदारी को पूरी ईमानदारी मानते हैं और व्यक्ति विशेष को पूरे सम्मान का अधिकारी मानते है | ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि समाज में ऐसे लोग कम ही दिखाई देते हैं | यह लोग विशेष सम्मान के अधिकारी हैं भी | ईमानदारी को और अधिक परिभाषित करें तो यह दो तरह की होती है एक तो पैसे की ईमानदारी और दूसरी वैचारिक ईमानदारी | वैचारिक ईमानदारी का ही हिस्सा है कार्य के प्रति ईमानदारी | कार्य के प्रति ईमानदारी दूसरा बहुत ही महत्व पूर्ण पहलू है | पैसे की ईमानदारी से देश व समाज का कुछ भला तो होता ही है लेकिन यह यह आत्म संतुष्टि भी देती है | जो लोग आत्म संतुष्टि से संतोष नहीं कर पाते, फिसलकर बईमानी की ओर चले जाते हैं | पैसे से ईमानदार, वैचारिक ईमानदारी भी रखता हो, यह ज़रूरी नहीं लेकिन वैचारिक ईमानदार व्यक्ति के लिए पैसे की ईमानदारी अनिवार्य शर्त है | ज़्यादातर व्यक्तिगत ईमानदारी रखने वाले लोग कार्य के प्रति ईमानदार होते हैं लेकिन सभी नहीं | इसमें यदि राजनीतिज्ञों और व्यापारियों को शामिल कर लें तो यह संख्या और कम हो जाएगी | आम तौर पर लोग मानते हैं कि राजनीति और व्यापार में समझोते करने होतें हैं | उन समझोतों को कुछ लोग बईमानी नहीं मानते | व्यक्तिगत ईमानदारी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाती है लेकिन कार्य के प्रति ईमानदारी पूरे समाज व देश को लाभ पहुंचाती है | उनकी व्यक्तिगत ईमानदारी से चंद रुपयों का लाभ ही समाज को मिल पाता है लेकिन उनका एक फैसला हमेशा के किये समाज को लाभ अथवा हानि पहुंचाता है | उदाहरण के लिए किसी व्यक्ति द्वारा 130 करोड़ की बेईमानी करने से प्रत्येक व्यक्ति के साथ एक रूपये की बेईमानी होती है लेकिन ईमानदारी से न किये गए काम से व्यक्ति के जीवन का सुख चैन और उल्लास की चोरी होती है | ऐसा न्यायालय प्रतिदिन करता है | न्यायालय में अन्याय उस दिन से शुरू हो जाता है जिस दिन वह न्यायालय का रुख करता है | इसीलिये कहा जाता है जो जीता वह हारा और जो हारा वह मरा | इस बात को अच्छी तरह समझने के लिए आप उच्चतम न्यायालय का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ अनेको ईमानदार न्यायाधीश हुए लेकिन बहुत ही कम जिन्होंने कार्य और समाज के प्रति निष्ठा रखी व सरकारों के प्रति नहीं | न्यायालयों में अनेकों पैसे से ईमानदार न्यायधीश हुए लेकिन उनका झुकाव शासित अथवा विरोधी राजनैतिक पार्टी के साथ होने की वजह से देश और समाज को वह नहीं दे पाए, जिसकी आवश्यकता थी | न्यायाधीशों के पास समाज के उत्थान ने लिए बहुत गुंजाइश होने के बावजूद, उन्होंने इस्तेमाल में कंजूसी दिखाई | न्यायधीशों की निष्ठा यदि सिर्फ अपने कार्य के प्रति होती तो वह राजनैतिज्ञों को उनकी मनमानी और भ्रष्टाचार से रोक सकते थे | प्रजातंत्र के दो स्तंभ न्यायालय और मीडिया यदि अपना कार्य ईमानदारी से करें तो राजनैतिज्ञ और प्रशासनिक तंत्र की हिम्मत नहीं जो आर्थिक या गैर आर्थिक भ्रष्टाचार कर सकें |
अनेको उदहारण है जब
न्यायालयों से लोगों की अपेक्षाएं जुड़ी थीं जैसे कैम्पाकोला सोसाइटी केस |
जिनके फ्लैट खाली कराकर तोड़ दिए गए उनको तो ज़रुरत से ज़्यादा
सजा मिली लेकिन उन भ्रष्ट आफिसर्स और राज नेताओं का क्या, जिनके कारण यह सब हुआ? लेकिन ऐसे बहुत से केस जो सामाजिक और राजनैतिक सरोकार के
रहे और सालों साल उनका नंबर नहीं आया या कभी भी नहीं आया और वह अपनी मौत मर गए
| 2014 में प्रधानमंत्री बनते ही
मोदी जी द्वारा दागी सांसदों के केस की जल्दी सुनवाई को उच्चतम न्यायालय द्वारा
नकार देना | कई बार
साधारण, अनावश्यक
केस को एक दो दिन में ही सुन लिया जाना | विवेक के नाम पर अजीब ओ गरीब फैसलों का दे दिया जाना |
अनावश्यक रूप से व्यक्तिगत टिप्पणी किया जाना,
कई बार डिकटेटरशिप का आभास कराते हैं |
स्वयं अपनी नियुक्ति के लिए कोलोजियम सिस्टम बना लिया जाना
जो विश्व में कही भी लागू नहीं | सभी लोग कहते हैं कि हमें न्यायालय में विश्वास है लेकिन
न्यायालय को संविधान में कितना विश्वास है यह कहना कठिन है |
न्यायालय ना सिर्फ अपनी समीक्षा से बचता है बल्कि किसी को
अपने उपर टिप्पणी को अपना अपमान मानता है | न्यायाधीश न्युक्ति की दलील तो देते हैं लेकिन दोनों सदनों
में सर्वसम्मति से पास बिल को निरस्त कर देते हैं | कहा जाता है सत्य एक होता है और जो समय और परिस्थितियों के
साथ बदलता नहीं | न्यायालयों
से अगर सत्य की वाणी उद्घोषित होती है तो फिर बेंच के दो न्यायधीशों की राय अलग
कैसे हो जाती है | 1975 में आपातकाल के समय बहुत से न्यायाधीशों ने कार्य के प्रति
ईमानदारी नहीं दिखाई और देश को ना सिर्फ आपातकाल में धकेलने का काम किया बल्कि आम
आदमी के अधिकारों के हनन में सहयोग दिया | बहुत से
उनके साथी न्यायाधीश आज भी उन फैसलों को गलत और अपने निजी स्वार्थ की वजह मानते
हैं | हमारे देश
में लोग सुबह राम कृष्ण को पूजते है और शाम को उनके कार्यों की समीक्षा करते है
लेकिन न्यायालय हो या मीडिया आलोचना पचा नहीं पाते | माडिया और न्यायालयों को उनकी आलोचना पगला देती है और वह
किसी हद तक जाने को तैयार रहते हैं | वैचारिक भ्रष्टाचार से घिरे राजनीतिज्ञों की तो बात ही क्या
की जाए | कार्य के
प्रति ईमानदार दो व्यक्तियों के नाम तुरन्त ही मस्तिष्क में आते हैं,
होंगे बहुत सारे और सभी क्षेत्रों में |
भूतपूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी और भूतपूर्व
राष्ट्रपति ए. पी. जे. अबुल कलाम जी | वैचारिक ईमानदारी अपने आस पास रहने वालों में भी देखी जा
सकती है | तटस्थ रहकर
फैसले लेना स्वयं और समाज देश के लिए हितकारी होता है | मुंशी प्रेमचंद की पञ्च परमेश्वर बेहतरीन उदाहरण है |
भारत के इतिहास में झांके तो पायेंगें पहले राजा न्याय करता था | राजा की प्रतिष्ठा की
समीक्षा में न्याय व्यवस्था का मुख्य स्थान होता था | राजा कैसा न्याय करता था
उसकी प्रतिक्रियायें इतिहास में दर्ज हैं | राजा राम हों या जहांगीर | आज न्याय प्रक्रिया भारत के
राजा यानि प्रधान मंत्री के पास नहीं है लेकिन न्यायायिक प्रक्रिया पर प्रहार का
शिकार वही बनता है | न्यायालय की कोई जवाब देही नहीं और वह साफ़ बाहर निकल आता है | शिथिल न्यायायिक प्रक्रिया
और निर्णयों का न्यायालय की साख और न्यायाधीश के करियर पर कोई फर्क नहीं पड़ता | न्यायालय ना तो राजा के
प्रति और ना ही प्रजा प्रति जवाब देह है | वह तो उस ब्रिटिश राजा और अब महारानी की तरह है जो कभी कोई गलती कर ही नहीं
सकता | यही भारत की समस्याओं की जड़
है | न्यायालय में सुधार के लिए
कोई तैयार नहीं | जजों की नियुक्ति हमेशा ही सवाल बना हुआ है |
चैक बाउंस होने जैसे मामूली केस में न्यायाधीश अपने कुल 5 मिनट भी नहीं देगा जिसके लिए वह
5 वर्ष लगाएगा, 32 माह गुज़र
चुके हैं | न्यायालय में व्याप्त भष्टाचार और देरी के लिए लिखे जाने पर सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय में जाने की सलाह देकर धारा 235 का हवाला
दिया लेकिन कॉलेजियम
सिस्टम से नियुक्ति की धारा का हम भारतीय नागरिकों को आज तक पता नहीं है | पेटिशन न. 39940 वर्ष 2018 को सर्वोच्च न्यायालय ने न्याय की
मूल भावना के विरुद्ध बिना विपक्ष को
बिना सुने फैसला सुना दिया जबकि कैविएट लगी थी और वकील मौजूद था | वकील ने बोलना चाहा लेकिन जज ने एक वाक्य भी बोलने
नहीं दिया और पेटिशनर के पक्ष में फैसला देने में 5 सेकंड भी नहीं लिए | इस सम्बन्ध में मुख्य न्यायाधीश को लिखने पर
उन्होंने मौन व्रत धारण कर लिया | आश्चर्य
जनक तरीके से मोदी जी ने इसे अदालत से जुड़ा माना जबकि यह मौलिक अधिकार से जुड़ा
मामला है और मै इसे जुडिशियल डिक्टेटरशिप की संज्ञा देता हूँ
जिसके विरुद्ध मैं भारतीय नागरिकों को लड़ाई लड़ने के लिए आवाहन करता हूँ |