हम स्वयं को गाली देना बंद करें, हम भारतीय ऐसे हैं या वैसे
हैं | हम अनुशासित नहीं हैं, हम बेइमान हैं आदि | हम सुधरेंगें तो देश सुधरेगा आदि
वाक्य हमें मूल विषय से भटकाव के लिए हैं | गौर कीजिए अब से 118 साल पहले पैदा हुए
स्व. लाल बहादुर शास्त्री जैसा ईमानदारी की पराकाष्ठा से जीवन
व्यतीत करने वाला व्यक्ति क्या 100 साल में समाज को बदल सका ? ऐसे सैकड़ों हजारों
व्यक्ति पैदा हुए और अपना निष्ठा पूर्ण जीवन जीकर चले गए तो क्या समाज बदल गया ?
साठ साल से मेरे पिता और अब मै घर के आसपास स्वक्षता के लिए समय श्रम और धन खर्च करतें
हैं और ऐसे सैकड़ों हजारों व्यक्ति समाज में हमसे कहीं अधिक समर्पित हैं तो क्या
समाज बदल गया? यह काम हमारे जैसे लोग अपनी संतुष्टि के लिए करते हैं | यह बात भी
सही नहीं कि भारतीय स्वक्षता का ध्यान नहीं रखते, भारतीय अनुशासित नहीं हैं तो फिर
कैसे भारत में मॉल, मेट्रो और एअरपोर्ट साफ़ रहते हैं जिन पर मेले जैसी भीड़ रहती है
? यही 15% भारतीय जो सिंगापुर में बसे हैं और यूरोप अमेरिका जैसे देशों में वहां
के नियमों का पालन करतें हैं तो फिर इसकी ईमानदारी से वजह खोजें | वजह है सरकार
द्वारा व्यवस्था देना और अनुशासन का पालन कराना | यह कहना भी ठीक नहीं कि अकेले
सरकार कुछ नहीं कर सकती ? यह अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ना है | आम जन टैक्स
देता है और भी देने के लिए तैयार है, व्यवस्था देना अन्यथा दण्डित करना सरकार का
काम | भ्रष्टाचार और रिश्वत खोरी रोकना भी आम जन का काम नहीं है, सरकार का है |
कुछ ही लोग स्वतः अनुशासन में विश्वास रखते हैं शेष तो पुलिस मैन के ना होने पर
रेड लाइट cross करना बेहतर समझते हैं | कार्यवाही ना होने पर एक तो देखकर दूसरा
नियम तोड़ता है | हम अपनी सरकारों और अधिकारियों की निष्क्रियता अपने सिर इसलिए
नहीं ले सकते कि वह भी इसी समाज से आये हैं | वह जब चाहे हमारे समाज का हिस्सा बन
जाते हैं और जब चाहे हमारे शासक बन जाते हैं | भ्रष्टाचारियों और रिश्वत खोरों को
हम अपने समाज का हिस्सा मानने से इंकार करते हैं |
जिस तरह सरकार ने कुछ धन खर्च कर गैस कनेक्शन देकर, ना केवल
केरोसिन सब्सिडी को हमेशा के लिए बचाया बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य को भी फायदा
पहुँचाया | आँखों और सांस की बीमारी में होने वाला खर्च में बचत की जो एक सराहनीय
कदम है और सरकार इसके लिए बधाई की पात्र है|
सारी दुनिया में कूड़ा फैकने के लिए ड्रम रखे जाते हैं और वहां
से कूड़ा ले जाने की single man व्हीकल व्यवस्था है | कूड़े के हीप जगह जगह बना कर
उन्हें बाद में ग्रीन किया जा सकता है ,
ऐसा कई जगह किया भी जा रहा है | हमें पार्क और विचरण के लिए जगाहों की आवश्यकता भी
है | कूड़े के हीप के ऊपर से पानी फिसलता हुआ नीचे चारों तरफ से ज़मीन के अन्दर चला
जाएगा | पॉलिथीन नाली या पशु के पेट में तब ही जायेगी जब उसको उड़ने के लिए छोड़
दिया जाएगा | ड्रम व्यवस्था में पॉलिथीन इस्तेमाल होती है कूड़े को फावड़ा परात से नहीं
उठाना पड़ता, गंदगी नहीं होती, बदबू और बीमारी कम होती है | कूड़ा उठाने का खर्च कम
होता है | हमें अन्य देशों की तरह अभी तीन नहीं बल्कि एक ही ड्रम की आवश्यकता है |
जहाँ तक so called NGOs का सवाल है अमेरिका हमसे 12 गुना ज़्यादा पॉलिथीन इस्तेमाल
करता है | भारत के लिए अभी पॉलिथीन सबसे सस्ता और अच्छा विकल्प है अन्यथा हम खेती
और जंगल बर्बाद करेंगें |
सरकार को एक बिल लाकर सभी नगरपालिकाओं और जिला पंचायतों को न
सिर्फ शुरू में ड्रम खरीद के लिए धन उपलब्ध कराना चाहिए बल्कि यह सुनिश्चित करना चाहिए
कि कोई पार्क, खान पान की दुकान, पेट्रोल पंप, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, सब्ज़ी फल
मंडी, कॉलोनी आदि बगैर ड्रम के ना रहे | अभी अपने नगर क्षेत्र में होने वाले खर्चे
को मै नज़दीक से देख रहा हूँ और विदेशों की व्यवस्था को देखने के बाद, पॉलिथीन
बदलने और कूड़ा फेकने का खर्च कूड़ा उठाने के मुकाबले कम आयेगा ऐसा मै विश्वास के
साथ कह सकता हूँ |