सेवा में, दिनांक: 01-09-2020
माननीय मुख्य न्यायाधीश
सर्वोच्च न्यायालय
नई दिल्ली
विषय: मीडिया द्वारा किया जा रहा आम आदमी का चरित्र हनन और मौलिक अधिकारों का हनन
महोदय,
आप किसी व्यक्ति की सहर्ष अनुमति से ही सवाल कर सकते हैं ज़ोर ज़बरदस्ती से नहीं | आरोपियों से सवाल करने के नियम और संस्थाए नामांकित हैं | मीडिया कैसे अपने माइक और कैमरा लेकर कई मिनट तक लोगों का रास्ता रोककर एक ही सवाल या अलग अलग सवाल एक बार अथवा बार बार कर सकता है ? मीडिया के बारे में कुछ भी बोलने पर वह उटपटांग दिन भर चिल्लाते रहते हैं | उनसे सवाल करने पर कहते हैं कि आप तो मीडिया पर ही सवाल उठा रहे हैं | उनके नियामक में क्या लिखा है पता नहीं | वह उसका कितना पालन करते हैं यह भी नहीं पता | आम लोग अथवा आरोपी अपनी परेशानी देखें या इनके खिलाफ केस करें ? इनके पास तो धन बल और सक्षम कानून विशेषज्ञ हैं | देश पूछ रहा कहकर अपने सवाल दागते रहते हैं जबकि देश को तो पता ही नहीं होता है कि यह सवाल उनके हैं जो सवाल वह पूंछ रहे होते हैं | बिना सबूतों के चरित्र हनन करते रहते हैं | किसको अपने चैनल पर आमंत्रित करें किस को नहीं इनका अपना फ़ैसला होता है | यदि कोई सबूत है तो दिखाएँ लेकिन वह अपनी राय कैसे बना सकते हैं ? बिना आरोपित को बुलाये उसके बारे में बोलना क्या उसके मौलिक अधिकार का हनन नहीं है ? किसी व्यक्ति को बोलने के लिए ज़बरदस्ती करना क्या मानसिक प्रताड़ना और उसके मौलिक अधिकार का हनन नहीं हैं ? अब समय आ गया है कि मीडिया की समीक्षा हो |
भवदीय,
सुबोध अग्रवाल
प्रतिलिपि: 1- माननीय कानून और न्याय मंत्री 2- माननीय सूचना एवं प्रसारण मंत्री