Sunday, 1 July 2018

शिक्षा संस्थानों में राजनीति


 
शशि शेखर जी के लेख नियमित ही पढ़ता हूँ, अच्छे होते हैं | आज भी हिन्दुस्तान दिनांक 1-7-2018 में ‘ शिक्षा मन्दिरों में सियासी कालिख ‘ शीर्षक वाला लेख पढ़ा | शीर्षक बहुत आकर्षक लगा लेकिन क्षमा करें, आप समस्या की जड़ तक नहीं पहुंचे | असल समस्या तो हमारे न्यायालय है जिसने कुछ वर्ष पूर्व दोबारा शिक्षा संस्थानों में चुनावों को लागू करा दिया | न्यायालय जब चाहते हैं बॉस बन जाते हैं जब चाहे पीछा छुड़ा लेते हैं | क्या हमारे यहाँ इतिहास में शिक्षा संस्थानों में राजनीति का स्थान था ? मैं अचरज करता हूँ जब 1970 के दशक में रुड़की विश्वविदयालय में मैं इंजीनियरिंग का छात्र था और मैस व विश्वविद्यालय की अलग अलग इकाइयों के लिए चुनाव होते थे, ज़्यादातर छात्र वोट देने के अलावा इस प्रक्रिया से अलग रहते थे, अपनी पढाई व खेल कूद और दूसरी extra curicular activities में व्यस्त रहते थे | लेकिन क्या वास्तव में चुनाव की आवश्यकता थी ? यदि मैस के या अन्य इकाइयों के संचालन में छात्रों की भागीदारी करानी ही हो तो अन्य साधारण तरीके अपनाए जा सकते हैं जैसे लाटरी अथवा सबसे ज्यादा अंक पाने वाला या सबसे कम अंक पाने वाला छात्र | दिल्ली विश्वविदयालय और JNU से लेकर पूरे भारत में नेताओं ने अपने लिए शिक्षा संस्थानों को उद्योग बना दिया है जहाँ विधान सभा और लोक सभा चुनावों की तरह भ्रष्टाचार और गुंडागर्दी व्याप्त है और भविष्य के लिए नेता तैयार किये जाते हैं | आप पायेंगें कि समूचे देश में शिक्षा संस्थाओं में राजनीति और चुनाव ही समस्याओं कि जड़ है | आप पढने आये हैं, पढाई और राजनीति का घालमेल नहीं हो सकता | वैसे भी भारत जैसे देश में जहाँ आम आदमी को रोज़ी रोटी, सुरक्षा और न्याय न मिलता हो वहां दूसरे वर्ग को ज़रुरत से ज़्यादा मान्यता और तरजीह, अनावश्यक महत्वाकांक्षायें ही पैदा करेंगीं | आप मेरा ब्लॉग ‘ क्या भारत में किसी को हड़ताल का अधिकार ‘ व ‘ कार्य के प्रति ईमानदारी ‘ भी पढ़ें |
वैसे भी देश की तमाम समस्याओं की जड़ में न्यायालय की दादागीरि और प्रक्रिया ज़िम्मेदार है और उसकी सही व गलत की व्याख्या करने की हिम्मत ना जुटाने के लिए मीडिया ज़िम्मेदार, वरना क्या हिम्मत कोई नेता, राजनेता, अफसर मनमानी और भ्रष्टाचार कर सके | चोरी और बलात्कार कि घटनाएं घटकर 2-4 प्रतिशत रह जाएँ यदि तुरत न्याय मिले | सप्ताह में 5 दिन, साल में 200 दिन, 4-6 घंटे प्रतिदिन काम करने वाले, अपनी मर्जी से संविधान विरुध्द कोलेजियम से अपनी नियुक्ति करने वाले न्यायालयों से न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?

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