भारत के इतिहास में झांके तो पायेंगें पहले राजा न्याय करता
था | राजा की प्रतिष्ठा की समीक्षा में न्याय व्यवस्था का मुख्य स्थान होता था |
राजा कैसा न्याय करता था उसकी प्रतिक्रियायें इतिहास में दर्ज हैं | राजा राम हों
या जहांगीर | आज न्याय प्रक्रिया भारत के राजा यानि प्रधान मंत्री के पास नहीं है
लेकिन न्यायायिक प्रक्रिया पर प्रहार का शिकार वही बनता है | न्यायालय की कोई जवाब देही नहीं
और वह साफ़ बाहर निकल आता है | शिथिल न्यायायिक प्रक्रिया और निर्णयों का न्यायालय
की साख और न्यायाधीश के करियर पर कोई फर्क नहीं पड़ता | न्यायालय ना तो राजा के
प्रति और नाही प्रजा प्रति जवाब देह है | वह तो उस ब्रिटिश राजा और अब महारानी की
तरह है जो कभी कोई गलती कर ही नहीं सकता | यही भारत की समस्याओं की जड़ है | न्यायालय
में सुधार के लिए कोई तैयार नहीं | जजों की नियुक्ति हमेशा ही सवाल बना हुआ है | लाखों
केस पेंडिंग हैं क्योंकि न्यायालय में 4-5 घंटे प्रतिदिन, सप्ताह में 5 दिन और साल
में 200 दिन से ज्यादा काम नहीं हो पाता | वकीलों को तारीखों पर तारीखें दी जाती
हैं | यदि जजों को ज़्यादा होम वर्क करना पड़ता है तो फिर क्यों नहीं सुबह 9 से
दोपहर डेढ़ बजे तक जजों की एक शिफ्ट काम करे और डेढ़ से 6 बजे तक दूसरी | 5 दिन की
जगह साढ़े तीन दिन जजों का एक सेट बाकि साढ़े तीन दिन जजों का दूसरा सेट काम करे |
त्योहारों और दूसरी छुट्टी जिसको लेनी हो लें लेकिन उनके स्थान पर दूसरे जज काम
करें | जज, वकील और उपभोक्ता गिने चुने दिन छोड़कर अपने लिए तारीखों का चुनाव करें
| 5-6 गुना काम हो सकता है | अलग से कोर्ट के इन्फ्रास्ट्रक्चर की ज़रूरी नहीं | क्लर्क
की नौकरी के लिये तो लोग मारे मारे फिर रहे हैं | क्या जज बनने के लिए भी हमारे पास
काबिल लोग नहीं ?
तुरत न्याय ही अपराध रोकने और समय बचाने का तरीका है जो देश
के विकास की मुख्य आवश्यकता है | जनसंख्या को अभिशाप नहीं वरदान माने |
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