आरक्षण में विरोधावास
आरक्षण जातीय आधार पर दिया
जाता है और आर्थिक आधार पर मांग को बराबर ठुकराया जाता रहा है | एक बार जो भी पढ़ाई
अथवा नौकरी में आरक्षण पा जाता है उसका समाज में उत्थान हो जाता है, उसका सामाजिक
स्तर स्वयं बदल जाता है यानि उसका व उसके परिवार में किसी की भी आरक्षण की आवश्यकता
समाप्त हो जाती है, तो फिर क्रीमी लेयर के नाम पर इसमें आर्थिक आधार क्यों घुसा
दिया गया ? हमारे न्यायालय भी मौन हैं | किसी की आमदनी एक रुपया हो या एक करोड़, वह
आधार क्यों बनना चाहिए ? बहुत से उच्च शिक्षा प्राप्त IIT/ IIM के पास आउट भी
जीविका चलाने में कठनाई महसूस करते हैं | अरबों कमाने वाले व्यवसायी भी कई बार
धाराशायी हो जाते हैं | सामाजिक और आर्थिक स्तर का यह घालमेल क्यों ? आठ लाख की
कमाई करने वाले हिन्दुस्तान में 5-10 प्रतिशत भी नहीं हैं तो फिर बाकि 90-95
प्रतिशत का क्या ? आर्थिक स्तर बनाना है तो सभी के लिए बना दें | सामाजिक रखना है
तो फिर सामाजिक ही रखें, यह घालमेल किसलिए ? यहाँ बहस हम आरक्षण पर नहीं सरकार की
नियत और घालमेल प्रवृति पर कर रहे हैं जो यह तय नहीं कर पाती कि हमें पहुचना कहाँ
है ? या यूँ कहें सरकार हर बात को बखूबी जानती है हमें बेवकूफ मानकर और बनाकर अपनी चालाकियों को हमें स्वीकार करने को मजबूर करती है |
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