प्रदर्शन, बंद, रैलियां, धार्मिक ग़ैर धार्मिक जुलूस, आंदोलन डेमोक्रेसी का हिस्सा हैं लेकिन
डेमोक्रेसी के नाम पर दूसरे देशवासियों जो आपके पक्ष में हों या विरोध में अथवा
न्यूट्रल, आप कैसे परेशान अथवा मजबूर कर सकते हैं ? आपका मौलिक अधिकार मेरे मौलिक अधिकार के आड़े
नहीं आ सकता और ना ही मेरे अधिकार के ऊपर आ सकता | यह सभी शासन, प्रशासन, यहाँ तक
कि न्यायालय भी भूल जाता है और उनको अपनी मनमानी करने देता है | कैसे शासन,
प्रशासन और न्यायालय इनके रास्ता अथवा रेल रोकने और तोड़फोड़ करने पर मौन रह सकता है
? न्यायालय जो कभी तो स्वतः संज्ञान लेता है और कभी आधी रात में खुल सकता है, वह कैसे जाट आन्दोलन पर 15 दिन
तक रेल्र रोकने पर मौन रहा, यह हमने ऊ. प्र. में कुछ वर्ष पूर्व अमरोहा के पास
देखा था और अक्सर देखते ही हैं देश भर में | प्रशासन डरपोक और गुलाम है, शासन वोटों का गुलाम लेकिन न्यायालय को क्या
हो जाता है यह मै आज तक भी समझने में असमर्थ हूँ ? कैसे कोई व्यवस्था दिनो दिन तक
इस पर अपनी मजबूरी ज़ाहिर कर सकती है ? कैसे सरकारी अथवा प्राइवेट संपत्ति के
नुक्सान पर सभी राजनैतिक, सामजिक पक्ष और मीडिया सिर्फ मौखिक खेद व्यक्त कर अपने कर्तव्य से छुटकारा पा सकते हैं ?
क्या आप "भीड़ के नाम पर किया गया नुक्सान" कहकर अपने कर्तव्य का निर्वाह कर सकते हैं
? क्यों नहीं प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष जुड़े लोगों को गिरफ्तार कर सजा व नुक्सान की
भरपाई की जाती है ? क्यों नहीं किसी को लिखित रूप में ही प्रदर्शन एवं बंद की
अनुमति किसी ख़ास जगह पर दी जा सकती ताकि बाकि देशवासियों को परेशानी ना हो,
रास्ता नहीं बदलना पड़े | हो उलटा रहा है प्रदर्शनकारियो को आज़ादी और बाकि
देशवासियों को प्रतिबंधित किया जा रहा है, उनके रास्ते बदले जा रहे हैं | पुलिस
वाला कहीं भी हाथ देकर दूसरी ओर मुड़ने का इशारा कर देता है | आपका घर चाहे 50-100
कदम की दूरी पर हो, आप अपने घर गाडी नहीं ले जा सकते | इलेक्शन कमीशन भी किसी से
पीछे नहीं | व्यवस्था के नाम पर नोमिनेशन के लिए कई दिन तक रास्ते बंद करवा देता है |
किसलिए जुलूस और रैली सड़कों पर इज़ाज़त अथवा बगैर इजाज़त हों ? दे दीजिए उनको रामलीला ग्राउंड या फिर भीड़ भाड वाले
इलाकों से दूर मैदान, शर्तों के साथ | एक को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दूसरे के
अधिकारों का अतिक्रमण, यह कैसा न्याय ?
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