Sunday, 15 October 2017

न्यायालय के फैसले और मै



 
मै कोर्ट के फैसले के विरोध में नहीं, विरोध तो मेरा कोर्ट के attitude से है | विरोध में होने में कोई न्यायालय अवमानना भी नहीं हो सकती क्योकि 5 में 3 जज समर्थन में 2 विरोध में फैसला देते हैं| मुझे उन 2 जजों के साथ जाने की छूट है  | सुप्रीम कोर्ट के फैसले को मानना मेरी मजबूरी है, लेकिन एक बात मेरी समझ से बाहर है कि जब सत्य एक होता है तो फिर क्या किसी फैसले में सत्य की खोज में, जजों के विचारों का घालमेल हो जाता है और पाँचों एक मत नहीँ हो पाते, सच खो जाता है | एक कोर्ट दूसरे कोर्ट के फैसले को पलट देता है और हम यह कहकर तसल्ली कर लेते हैं कि उसने तथ्यों को दूसरी तरह से देखा | क्या इस तरह की माफी एक डॉक्टर को मिल सकती है? पर्यावरण पर पटाखों पर रोक के मै समर्थन में हो सकता हूँ लेकिन यह मेरी समझ से बाहर है कि यह फैसला आख़िरी समय पर क्यों आया ? यदि याचिका पुरानी थी और आवश्यक थी तो फिर पहले क्यों नहीं सुनी गयी ? यदि आखिरी समय पर आयी तो उनको बाद में सुनने के लिए क्यों नहीं कहा गया ? उन व्यापारियों का क्या जो इस फैसले से जुड़े हैं ? ऊपर जो attitude की बात मैंने की वह यही है कि जब चाहे सुने, जैसे चाहे सुने, जिसे चाहे सुने और जो चाहे comment करें | दूसरा कोई ऐसा करे तो अवमानना | प्रजातंत्र में 5 में से 2 जज शेष जनता का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि फैसले बहुमत के ही मान्य होते हैं | इन फैसलों को कोई भी मानने से इन्कार नहीं कर सकता है लेकिन समीक्षा तो कर सकता है | प्रजातंत्र में न्यायालय सबसे ज़िम्मेदार संस्थायों में से एक संस्था है जिसके छोटे से छोटे फैसले से भी समाज की दिशा बदल सकती है | लगता है मुंशी प्रेमचंद का पंच परमेश्वर कहीं खो गया है |

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