Sunday, 5 November 2017

Election Reform



                                                           
चुनाव आयोग election reform में महत्त्व पूर्ण भूमिका निभा सकता है, जैसे कि शेषन जी ने वर्षों पूर्व संविधान के तहद और उसी व्यवस्था के रहते ऐतिहासिक कदम उठाया और सभी कुछ ना नुकर के बाद मानने को बाध्य हुए | संविधान से कहाँ से क्या बिन्दु उठाकर लाना है इसे सिविल सेवा के अधिकारी बखूबी जानते हैं |  चुनाव आयोग को अब उनके द्वारा सभी राजनैतिक प्रत्याशियों और पार्टियों को हर शहर और कस्बे में अनेक मंच बिना पैसा लिए लाटरी सिस्टम से उपलब्ध करा देना चाहिए | वहां कुछ धन विज्ञापन के जरिये उगाहाना चाहिए और सरकार से अपने लिए फण्ड बढाने की मांग करनी चाहिए | इलेक्शन के लिए अन्य सामिग्री एक जैसी प्रिंट करायें और प्रत्याशियों को पैसा लेकर दें | प्रत्याशियों के खर्चे की सीमा कम कराने को सरकार से अनुरोध करें | जुलूस और लाउड स्पीकर सभा स्थल के अलावा प्रतिबंधित हों | मंच, कुर्सी, दरी इत्यादि पहले दिन से आखिरी दिन तक उपलब्ध हो | सभी अखवारों और टी.वी. में प्रत्याशियों की लिस्ट जारी करें | दीवारों आदि पर पोस्टर प्रतिबंधित हों | चुनाव आयोग ही बैनर लगाकर प्रत्याशियों की लिस्ट जारी करें | इसमें कुछ पैसा विज्ञापन से अर्जित किया जा सकता है | टी.वी. पर प्रत्याशियों की बहस के लिए टी.वी. से पैसा वसूल करें | यदि आवश्यक हो तो सरकार से बिल पास कराने का अनुरोध करें ताकि सरकारी पैसे की बचत हो | टी. वी. चैनल से बहस का पैसा लेना अजीब लग सकता है लेकिन कुछ समय बाद यह ठीक लगने लगेगा जब सरकार बिल पास  करा लेगी | वाहन अधिग्रहण करने की जगह खुले बाज़ार से बाज़ार भाव पर विज्ञापन कर इलेक्शन टीम के लिए वाहन लें ताकि उनकी प्रतिष्ठा बनी रहे और व्यापारी वर्ग के साथ न्याय हो सके |
राजनैतिक पार्टियों को एक रुपया भी कैश में लेने का अधिकार क्यों हो जबकि गोलगप्पे भी कैशलेस प्रक्रिया से खाने की बात हो रही हो | जब सरकार कहती है सबके बैंक एकाउंट खुल गए हैं और यदि नही तो वह चन्दा देने से पहले खुलवा ले | स्रोत 100% पारदर्शी क्यों नहीं ?

बांड का गड़बड़ घोटाला क्यों ?
इलेक्शन के लिए राजनैतिक पार्टियों या प्रत्याशियों को सरकारी funding का कोई भी औचित्य समझ नहीं आता है | क्या संविधान में इलेक्शन लड़ना ही अकेला संवैधानिक अधिकार है, चाहे आप अंगूठा छाप हो या जेल में ? जब टैक्स के पैसे को इनको देने की बात होती है तो फिर कल कोई व्यक्ति कह सकता है मुझे शिक्षा और व्यवसाय के लिए लोन दो वह भी बगैर ब्याज के और ब्याज क्यों, मै तो मूलधन भी वापिस नहीं करूंगा | नहीं तो भ्रष्टाचार करूंगा जैसे कि राजनैतिक दल और बुद्धिजीवी रोज़ दलील देते हैं ?
इलेक्शन के लिए क्या सचमुच में पैसा चाहिए, वह भी आज के इलेक्ट्रोनिक युग में जब पलक झपकते ही सन्देश एक स्थान से दुसरे स्थान पर पहुंच जाता है | क्या प्रत्याशियों के लिए मतदाता को चिल्ला चिल्ला कर बताना होगा कि मै भी खड़ा हूँ ? क्या मतदाता इतना बेखबर है ? यदि हाँ तो क्या आप ऐसे मतदाता को खबरदार कर सकते हो ?

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