आपका एडिटोरियल हिन्दुस्तान अखवार दिनांक 10
अप्रैल 2019 में पढ़ा | कृपया संपादक जी को यह पत्र प्रेषित कर दें |
“ आप से ऐसी उम्मीद नहीं थी | हिन्दुस्तान अखवार
के महोदय यदि किसी अपराध को इसलिए अपराध नहीं मानेंगे क्योंकि सभी इस अपराध को कर
रहे हैं | मैने अभी पिछले सप्ताह मुख्य चुनाव आयुक्त को रजिस्टर्ड पोस्ट से पत्र
भेजा है और ब्लॉग भी लिखा है आप इच्छुक हों तो पढ़ें “ अपना अपना सोच “ login:
apnapnasoch.blogspot.in
क्या चुनाव के लिए सारे नियम ताक पर रखे जा सकते
हैं ? चुनाव लड़ना ही क्या अकेला मौलिक अधिकार है ( क्या रोजी रोटी मौलिक अधिकार नहीं
) जो एक अनपढ़ भी लड़ सकता है, चाहे जेल में ही क्यों ना हो ? कुछ भी कहे, कोई भी
वायदा करे लिखित अथवा अलिखित, वोट के लिए सामान अथवा कैश दे नहीं लेकिन वायदा करे
| आम आदमी के खिलाफ किसी को लिखित अथवा अलिखित वायदा खिलाफी साबित होने पर अपराध
मानते हुए दंड का भागीदार होना पड़ सकता है लेकिन राजनीतिज्ञों के लिए कोई सज़ा नहीं
चाहे वह वायदा पूरा करे या नहीं | शायद न्यायालय और पत्रकारों ने भी चुनावी वायदों
को मज़ाक के रूप में ही लिया है| अभी कल एक पार्टी के अध्यक्ष ने उच्चतम न्यायालय
का ज़िक्र कर वह कहा जो उच्चतम न्यायालय ने कहा ही नहीं लेकिन उच्चतम न्यायालय को
कोई अवमानना महसूस नहीं होती | प्रचार की हर माध्यम से भरपूर अनुमति के बाद भी चुनाव
आयोग का एक पिक्चर और एक टी.वी. चैनेल को बंद करने का आदेश समझ से परे है सिवाय
इसके कि अपने आप को ईमानदार साबित करने की कोशिश के | ऐसा सिर्फ वही करते हैं
जिन्हें अपनी ईमानदारी पर स्वयं शक होता है | हमारा निर्वाचन आयोग ने तो शेषन जी
पहले भी कुछ नहीं किया और बाद में भी | उनका कमाया खा रहे हैं |
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