आम तौर से हम पैसे की ईमानदारी को पूरी ईमानदारी मानते हैं और व्यक्ति विशेष
को पूरे सम्मान का अधिकारी मानते है | ऐसा हम इसलिए करते हैं क्योंकि समाज में ऐसे
लोग कम ही दिखाई देते हैं | यह लोग विशेष सम्मान के अधिकारी हैं भी | ईमानदारी का
दूसरा बहुत ही महत्व पूर्ण पहलू है कार्य के प्रति ईमानदारी | ज़्यादातर व्यक्तिगत
ईमानदारी रखने वाले लोग कार्य के प्रति ईमानदार होते हैं लेकिन सभी नहीं | इसमें
यदि राजनीतिज्ञों को शामिल कर लें तो यह संख्या और कम हो जाएगी | आम तौर पर लोग
मानते हैं कि राजनीति और व्यापार में समझोते करने होतें हैं | उन समझोतों को
बईमानी नहीं माना जाता | व्यक्तिगत ईमानदारी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाती है
लेकिन कार्य के प्रति ईमानदारी पूरे समाज व देश को लाभ पहुंचाती है | उनकी
व्यक्तिगत ईमानदारी से चंद रुपयों का लाभ ही समाज को मिल पाता है लेकिन उनका एक
फैसला हमेशा के किये समाज को लाभ अथवा हानि पहुंचाता है | इस बात को अच्छी तरह
समझने के लिए आप उच्चतम न्यायालय का उदाहरण ले सकते हैं जहाँ अनेको ईमानदार न्यायाधीश
हुए लेकिन बहुत ही कम जिन्होंने कार्य और समाज के प्रति निष्ठा रखी व सरकारों के
प्रति नहीं | न्यायाधीशों के पास समाज के उत्थान ने लिए बहुत गुंजाइश होने के
बावजूद, उन्होंने इस्तेमाल में कंजूसी दिखाई | न्यायधीशों की निष्ठा यदि सिर्फ
अपने कार्य के प्रति होती तो वह राजनैतिज्ञों को उनकी मनमानी और भ्रष्टाचार से रोक
सकते थे |
ईमानदारी को और अधिक परिभाषित करें तो यह दो तरह की होती है एक तो पैसे की
ईमानदारी और दूसरी वैचारिक ईमानदारी | वैचारिक ईमानदारी का ही हिस्सा है कार्य के
प्रति ईमानदारी | पैसे के प्रति ईमानदारी काफी लोगों में पाई जाती है | पैसे की
ईमानदारी से देश व समाज का कुछ भला तो होता ही है लेकिन यह यह आत्म संतुष्टि भी
देती है | जो लोग आत्म संतुष्टि से संतोष नहीं कर पाते, फिसलकर बईमानी की ओर चले
जाते हैं | पैसे से ईमानदार, वैचारिक ईमानदारी भी रखता हो, यह ज़रूरी नहीं लेकिन
वैचारिक ईमानदार व्यक्ति के लिए पैसे की ईमानदारी अनिवार्य शर्त है | वैचारिक
ईमानदारी का ही एक हिस्सा है कार्य के प्रति ईमानदारी| बहुत कम लोगों में इस
वैचारिक ईमानदारी को देखा जा सकता है | उदहारण के लिए न्यायालयों में अनेकों पैसे
से ईमानदार न्यायधीश हुए लेकिन उनका झुकाव शासित अथवा विरोधी राजनैतिक पार्टी के
साथ होने की वजह से देश और समाज को वह नहीं दे पाए, जिसकी आवश्यकता है | अनेको
उदहारण है जब न्यायालयों से लोगों की अपेक्षाएं जुड़ी थीं जैसे कैम्पाकोला सोसाइटी
केस | जिनके फ्लैट खाली कराकर तोड़ दिए गए उनको तो ज़रुरत से ज़्यादा सजा मिली लेकिन
उन भ्रष्ट आफिसर्स और राज नेताओं का क्या, जिनके कारण यह सब हुआ? लेकिन ऐसे बहुत से केस
जो सामाजिक और राजनैतिक सरोकार के रहे और सालों साल उनका नंबर नहीं आया या कभी भी
नहीं आया और वह अपनी मौत मर गए, जैसे आम आदमी पार्टी का दिल्ली विधान सभा गठित ना
होने पर भंग कराकर दुबारा चुनाब कराने की गुहार | प्रधानमंत्री बनते ही मोदी जी
द्वारा दागी सांसदों के केस की जल्दी सुनवाई को उच्चतम न्यायालय द्वारा नकार देना |
कई बार साधारण, अनावश्यक केस को एक दो दिन में ही सुन लिया जाना | विवेक के नाम पर
अजीब अजीब फैसलों का दे दिया जाना | अनावश्यक रूप से व्यक्तिगत टिप्पड़िया किया
जाना, कई बार डिकटेटरशिप का आभास कराते हैं | स्वयं अपनी नियुक्ति के लिए कोलोजियम
सिस्टम बना लिया जाना जो विश्व में कही भी लागू नहीं | सभी लोग कहते हैं कि हमें
न्यायालय में विश्वास है लेकिन न्यायालय को संविधान में कितना विश्वास है यह कहना
कठिन है | न्यायालय ना सिर्फ अपनी समीक्षा से बचता है बल्कि किसी को अपने उपर
टिप्पड़ी को अपना अपमान मानता है | न्यायाधीश न्युक्ति की दलील तो देते हैं लेकिन
दोनों सदनों में सर्वसम्मति से पास बिल को लागू करने में अड़ंगे लगाते नज़र आते हैं
| कहा जाता है सत्य एक होता है और जो समय और परिस्थितियों के साथ बदलता नहीं |
न्यायालयों से अगर सत्य की वाणी उद्घोषित होती है तो फिर बेंच के दो न्यायधीशों की
राय अलग कैसे हो जाती है | कहा जाता है कि सत्य समय और परिस्थितियों के अनुरूप
बदलता नहीं है | सिर्फ सत्य ही अपरिवर्तनशील है | 1975 के आपातकाल के समय भी बहुत
से न्यायधीशों ने कार्य के प्रति ईमानदारी नहीं दिखाई और देश को आपातकाल में ना
सिर्फ धकेलने का काम किया बल्कि गलत फैसले देकर लोगों के अधिकारों का हनन किया |
बहुत से उनके साथी न्यायाधीश आज भी उन फैसलों को गलत और अपने निजी स्वार्थ की वजह
मानते हैं | हमारे देश में लोग सुबह राम कृष्ण को पूजते है और शाम को उनके कार्यों
की समीक्षा करते है लेकिन न्यायालय हो या मीडिया आलोचना पचा नहीं पाते | माडिया और
न्यायालयों को उनकी आलोचना पगला देती है और वह किसी हद तक जाने को तैयार रहते हैं
| वैचारिक भ्रष्टाचार से घिरे राजनेताओ की तो बात ही क्या की जाए | कार्य के प्रति
ईमानदार दो व्यक्तियों के नाम तुरन्त ही मस्तिष्क में आते हैं, होंगे बहुत सारे और
सभी क्षेत्रों में | भूतपूर्व प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री और भूतपूर्व
राष्ट्रपति ए. पी. जे. अबुल कलाम | वैचारिक ईमानदारी अपने आस पास रहने वालों में
भी देखी जा सकती है | तटस्थ रहकर फैसले लेना स्वयं और समाज देश के लिए हितकारी
होता है | मुंशी प्रेमचंद की पञ्च परमेश्वर बेहतरीन उदाहरण है |
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