मै यह भावना देश के बहुत से
देशवासियों की ओर से रख रहा हूँ | मै इस देश का वासी हूँ और अपनी विशेषज्ञता से
देश सेवा करना चाहता हूँ तो क्या एक ही रास्ता है कि लोकसभा या राज्यसभा का
इलेक्शन लडू जैसा कि सारे राजनैतिज्ञ ओर पत्रकार कहते हैं | क्या मै अपनी बात नहीं
कह सकता यदि मै पत्रकार नहीं हूँ ? लोकतंत्र की इस परिभाषा पर भी विचार होना चाहिए
| ऐसे बहुत से विशेषज्ञ हैं जो अपने विषय के माहिर हैं और अपनी सेवायें कहीं और दे
रहे हैं लेकिन उनकी सेवाओं की देश को लोकसभा / राज्यसभा में उनके विषयों पर
विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है | हमारे प्रतिनिधि जो लोकसभा / राज्यसभा में जाते
हैं वह किसी एक दो विषय के माहिर हो सकते हैं लेकिन सभी विषयों के नहीं जबकि वह
लोकसभा / राज्यसभा में पूरी विशेषज्ञता दिखाते हैं या फिर बोलते ही नहीं और उसका
नुक्सान अक्सर बिलों में दिखाई देता है | जो विशेषज्ञता उपलब्ध है उसका हम उपयोग
नहीं करते और अक्सर नज़र अंदाज़ करते हैं | टी. वी. पर debate में उनके विचार खो
जाते हैं और सांसदों तक नहीं पहुँचते, और वैसे भी ज्यादातर सांसद तो अहंकार में
डूबे होते हैं और उन इक्का दुक्का लोगों के विचार को सुनते ही नहीं, वह तो अपने को
सर्वोपरी मानते हैं | टी. वी. anchor जो निश्चित ही विशेषज्ञ नहीं है, विशेषज्ञ की
हैसियत से राय रखता है क्योकि माइक उसके हाथ में है | टी. वी. anchor देशवासियों
का नाम लेकर ‘देश पूछ रहा है’ जबकि देश को तो अभी खबर भी नहीं है अपने उलटे सीधे
सवाल दाग देता है |
मेरा सुझाव है कि क्योंकि
वह हमारे चुने हुए प्रतिनिधि हैं संसद में वोट देने का अधिकार उन्हें है | संसद
वोट देने के लिए हो बहस के लिए नहीं, वैसे भी बहस की विशेषज्ञता संसद के बाहर
ज्यादा है अन्दर कम | संसद में कई बिल बगैर बहस के भी पास हो जाते हैं या बगैर
सार्थक बहस के | संसद अवरोध भी बहस के कारण होता है | बिल संसद में रखा जाये और
टी.वी. पर official डिबेट के लिए 15-30 दिन के लिए अनिवार्य रूप से लोकसभा /
राज्यसभा चैनेल पर रखा जाये | सांसद जो
भाग लेना चाहें भाग लें और विशेषज्ञों को विशेष निमंत्रण दिया जाये | बाकि
विशेषज्ञों को भी दूसरे चैनल पर अपनी राय रखने का मौका होगा | पार्टी से हटकर आम
राय भी सामने आयगी |
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