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लोकतंत्र में अपने अधिकार की बात करना प्रार्थना कैसे हो सकती है ? न्याय मांगना कैसे हो सकता है ? आप अपने साथ हुए अन्याय के लिए न्याय नहीं, अधिकार की बात करते हो | मांग करने का अर्थ यह भी नहीं कि प्रार्थना की जाए | राजे महराजे वाली व्यवस्था जब राजा सर्वेसर्वा हुआ करता था उसकी न्याय व्यवस्था उसकी लोक प्रियता का पैमाना होती थी आज जो राज करता है न्याय व्यवस्था उसके आधीन नहीं | विडंबना है कि जिसके पास न्याय व्यवस्था है उसकी जवाब देही नहीं ना तो पद पर रहते हुए ना पद से हटने के बाद | आज जिसको न्यायाधीश कहते हैं उसे फैसला देने का अधिकार कुछ समय के लिए दिया जाता है | पद ग्रहण करने से पूर्व और फिर बाद मे वह स्वयं इस समाज का हिस्सा हो जाता है | वह स्वयं भी अपने किसी फैसले के लिए इसी न्यायालय मे आने को मजबूर होता है अपने ऊपर हुए अत्याचार अथवा स्वयं के ऊपर हुए किसी मुकदमे में | देश इन्ही स्वनियुक्त न्यायाधीशों का बंधक बना हुआ है | लोकसभा और राज्य सभा से बहुमत से पास बिल तो छोड़िए सर्वसम्मति से पास बिल को भी न्यायालय जब चाहे धता बताया देता है जब चाहे संविधान के मूल ढांचे को बदलने वाले बिल पर मौन साधे रहता है | जब चाहे एक हत्या/ बालात्कार का स्वतः संज्ञान लेता है जब चाहे हजारों कश्मीरी पंडितों की हत्या और बलात्कार और मौलिक अधिकारों के हनन पर चुप्पी साधे रहता है |
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