Sunday, 31 March 2019

चुनाव सुधार के सम्बन्ध में


आपका ध्यान अपने भूतपूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त श्री टी.एन.शेषन जी के कार्यकाल की ओर आकर्षित करना कहेंगें | शेषन जी ने इसी संविधान के अंतर्गत इन ही राजनैतिज्ञों और अफसरों के रहते न सिर्फ चुनाव आयोग की शक्ति का ही आभास कराया एवं अंकुश लगाया बल्कि प्रतिष्ठा भी दिलाई | उसके पहले भी कुछ नहीं हुआ और उसके बाद में भी, सिर्फ momentum से ही चुनाव आयोग को चलता पाते हैं | आवश्यकता है निम्न बिंदुयों पर विचार करने की |
1-       क्या सरकार द्वारा 4 साल से चलती पूर्व घोषित उज्जवला योजना को रोककर इसके लाभार्थियों के प्रति अन्याय नहीं है ? इससे उन्हें नुकसान पहुंचना है जबकि distributor को तो दो माह बाद मौका मिलेगा ही | पैसा तो पहले ही जारी हो चुका है |
2-       क्या किसी वर्ग विशेष अथवा सबको मुफ्त का सामान अथवा पैसा बाटने वाली स्कीम रिश्वत देने का वायदा नहीं है ? विज़न अलग बात है, उनको झूठे वायदे की सुविधा क्यों मिलना चाहिए | क्या वायदे पूरे ना करने की स्थिति में उन पर अपराधिक मुकदमा नहीं चलना चाहिए? हाथ बंधे होने का बहाना शेषन जी ने नहीं बनाया और संविधान में कोई बदलाव भी नहीं कराया |
3-       क्या ट्रांसपोर्टर, गैस एजेंसी और दूसरे संस्थानों की गाड़ियाँ जबरन चुनाव के लिए लेना अन्याय नहीं है? आप टेंडर निकाल कर ज़रुरत से ज़्यादा गाड़ियां प्राप्त कर सकते हैं, ज्यादा पैसा देना होगा | क्या रिटायरमेंट के बाद देश भक्ति के नाम पर आप अपनी कार देना चाहेंगे?
4-       पेट्रोल पंप, गैस एजेंसी व अन्य संस्थानों से ज़बर दस्ती उनके पैसे से बैनर लगवाना अन्यथा नतीजा भुगतने वाले जुमले ठीक हैं? क्या आप अपनी सैलरी से देश हित में यह काम करना चाहेंगें? मेरे व्यक्तिगत अनुभव से इसकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि गांव शहर का कोई व्यक्ति ऐसा नहीं होता जिसे पता न हो कि आज वोट पड़ेंगे और किस चीज़ की छुट्टी है?
5-       बैंक तो वैसे ही आये दिन बंद रहते हैं और देश के सबसे कम काम करने वाले संस्थान हैं ऊपर से आप आये दिन की ट्रेनिंग से समस्या पैदा करते हैं | क्या उनके छुट्टी के दिन जैसे शनिवार रविवार को यह ट्रेनिंग नहीं करा सकते? इनको 365 दिन 24 घंटे बिजली, पानी, रेल, बस, हवाई जहाज, होटल रेस्टोरेंट, पेट्रोल-डीज़ल सबकी अपेक्षा है लेकिन खुद साल में 250 दिन 7 घंटे प्रतिदिन से कम काम करते हैं | बच्चों के स्कूलों जितनी छुट्टी करते हैं |
6-       मैं 38 वर्ष उम्र तक वोट नहीं डाल पाया क्योंकि वोट पैतृक शहर में और नौकरी दूसरे शहर में | वहां वोट बन नहीं पाया | मंत्री, प्रधान मंत्री तो जनता के पैसा खर्च कर वोट डालने चले जाते हैं | अपने परिवार के कई व्यक्तियों के 2-3 वोट बने हैं पुराने और नए पते पर, पुराने वोट कैंसिल नहीं हो पा रहे है | कुल 50 व्यक्तियों के 100 वोट में से 20-25 वोट ही पड़ते हैं क्योंकि बच्चे बाहर और 2-3 बिस्तर से बंधे या 2-3 ज़रूरी काम से बाहर या विदेश में | आप प्रतिशत ही गिनते रहते हो | मैने तो पिछले बहुत सालों से किसी व्यक्ति को जिसका वोटर लिस्ट में नाम हो और शहर में भी मौजूद हो, बगैर वोट डाले देखा नहीं है | वोट डाल कर पिकनिक पर जाते हैं | किसी के घर मृत्यु हो सकती है तो किसी के यहाँ शादी | कोई अस्पताल में हो सकता है कोई रेलगाडी में | जिसको वोट नहीं डालना है बैनर बनवाकर वोट डलवा लेंगे क्या? जागे को जगा सकते हैं क्या? इस पैसे का कहीं और उपयोग करें | show off छोड़कर हकीकत का रास्ता कायम करें | वोट डालने के अन्य तरींकों पर विचार करें |
7-       आपको एक प्रपोजल देना चाहूंगा | विचार करें | मील का पत्थर साबित हो सकता है |
(a)     हर शहर कस्बे में तीन चार जगाहें ऐसी होती हैं जैसे रामलीला ग्राउंड, ईदगाह और दूसरे मैदान जिन पर चुनाव आयोग को टेंट स्टेज कुर्सी लाउडस्पीकर आदि का 15-20 दिन के लिए पैसे लेकर लाटरी सिस्टम से प्रताशियों को जगह उपलब्ध करानी चहिये | किसी को व्यक्तिगत व्यवस्था की स्वीकृति ना दी जाए | रैलियों के सम्बन्ध में भी विचार करेंगें तो अनेको सुझाव आयेंगें |
(b)     बैनर पर्चों आदि को भी स्वयं प्रिंट करा कर दें, पैसा वसूल करें | गाड़ियां भी सीमित संख्या में परमिट करें |
चुनाव खर्च को घटा कर एक लाख या कम करें | सिर्फ पेट्रोल बस्तों आदि के लिए ही पैसे की ज़रुरत हो | आप जो पैसा बैनर स्टेज के लिए लें वह अलग हो |
(c)      सरकार अखवारों को subsidy देती है उनसे प्रताशियों का मुफ्त विज्ञापन करायें ताकि पब्लिक तो प्रताशियों की जानकारी हो सके |
(d)     T.V. पर डिबेट कराएँ और T.V. वालों से पैसा वसूल करें वैसे भी वह सीरियल के लिए पैसा देते हैं | उनको कोई भी फ्री डिबेट allow न हो | इससे आपको खर्चे और व्यवस्था के लिए सरकार पर कम निर्भर करना पडेगा |
अटल बिहारी जी के संसद में चुनाव खर्च सरकार द्वारा वहन करने की सलाह के विरोध में तब के लोक सभा अध्यक्ष स्व. श्री संगमा जी को पत्र लिखा था कि क्या लोकतंत्र में सिर्फ चुनाव लडना मूलभूत अधिकार है जिसके लिए आज के समय में अंगूठा छाप को परमिट किया जाए | सरकारी पैसे को भी चुनाव के लिए दिया जाय | कल यदि कोई व्यक्ति यह कहे मुझे नौकरी दो या फिर कारोबार के लिए लोन वह भी ब्याज मुक्त और मै मूल भी क्यों लोटाऊँ जब राजनैतिज्ञ चुनाव खर्च मुफ्त में पायेगा? नहीं तो मै भ्रष्टाचार करूंगा जैसे सारे राजनैतिज्ञ कहते है कि चुनाव खर्च ही भ्रष्टाचार की जड़ है | आज आपको यह सब बातें अजीब लगेंगी लेकिन कल प्रतिष्ठा मिलेगी और भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी |

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