भारत में हड़ताल का अधिकार किसी को नहीं
हड़ताल कौन करता है जिसके पास काम है, आमदनी है कम या
ज्यादा, पेट भरा है | सरकारी नौकरी हो या प्राइवेट, व्यापार हो या संस्था,
इंजीनियर हो या डॉक्टर, वकील हो या चार्टर्ड अकाउंटेंट, अस्पताल हो या दुकान, रेल
हो हवाई जहाज, रोडवेज हो या प्राइवेट टैक्सी, पेट्रोल पंप हो या गैस एजेंसी, होटल
हो या रेस्टोरेंट, रेड़ी वाला हो या फल-सब्ज़ी वाला, चाहता है कि उसको और अधिकार
मिले और पैसा मिले और मलाई मिले लेकिन उसका क्या, जो संगठित नहीं है ? उस मजदूर-
गरीब का क्या जो 50 की उम्र में बुड्ढा हो जाता है | मजदूरी भी कर नहीं पाता, कोई
मेडिकल सुविधा नहीं, कोई insurance नहीं, कोई पेंशन नहीं | दूसरी ओर उसी का सगा
भाई जो किसी भी जाति धर्म का हो, आरक्षण से या बगैर आरक्षण के नौकरी पा जाता है और
फिर बगैर रिश्वत-भ्रष्टाचार के या रिश्वत-भ्रष्टाचार करते हुए आये दिन बंद हडताल
में भागीदार बनता है | वह उस ही समाज को कष्ट देता है जिसके बलबूते अपना घरबार
चलाता है | ज़ुल्म के खिलाफ उदहारण भी मिलते हैं लेकिन ज़ुल्म क्या सिर्फ संगठित
लोगों के खिलाफ ही होते हैं ? क्या आपने कभी दूसरों के अधिकार के लिए हड़ताल देखी-सुनी
? क्या बंद-हड़ताल से ज़ुल्म का समाधान हो जाता है ? राजनीतिज्ञों की आलोचना कर इस
लेख को मै दूषित नहीं करना चाहता | हमारे न्यायालय भी चुपचाप सब देखते रहते हैं | आन्दोलन
और प्रदर्शन जनतंत्र का ज़रूरी हिस्सा हैं तब तक जब तक यह दूसरों को परेशान नहीं
करते | क्या आपने सुना है कि किसान कहे हम अनाज नहीं उगाएंगें ? किसानो का शान्ति
पूर्ण आन्दोलन इसका उदहारण है, जिसको पूरे तौर पर तो नहीं लेकिन आंशिक तौर पर
सराहा जा सकता है | आप सड़कों और रेल ट्रैक पर जाम लगाकर दूसरों का संवैधानिक
अधिकार छीन रहो हो | मै IIT graduate होने के नाते पहले प्राइवेट नौकरी और अब
व्यापार में हूँ और पूरे विश्वास के साथ कहता सकता हूँ कि लोभ के कारण ही व्यापारी
या नौकरी करने वाले हडताल करते हैं | जो लोग लोभ में नहीं हैं उन्हें कम सुविधा और
कम आमदनी के रहते भी हड़ताल का विचार मन में नहीं आता क्योंकि वह आपने को उतनी
आमदनी और अधिकार में संतुष्ट पाते हैं | हड़ताल करना एक विकृति है और दूसरों का
अधिकार छीनने का यंत्र | जिस समाज से प्रतिष्ठता और पैसा पाते हैं उसी समाज के
विरुद्ध हड़ताल कर कृतघ्नता का परिचय देते हैं |
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