Saturday, 10 April 2021

सड़ चुकी न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी सिस्टम व उससे आती दुर्गंध से बीमार होता समाज और देश

 

सेवा में,

माननीय मुख्य न्यायाधीश                                                                              दिनांक :  10-04-2021

सर्वोच्च न्यायालय

नई दिल्ली

विषय: सड़ चुकी न्यायिक प्रक्रिया और कानूनी सिस्टम व उससे आती दुर्गंध से बीमार होता समाज और देश

महोदय,

सर्वोच्च न्यायालय को हर विभाग मे सुधार की आवश्यकता दिखाई देती है लेकिन न्यायालय मे नहीं | सर्वोच्च न्यायालय ऐसी किसी भी प्रक्रिया मे अड़चने भी पैदा करता है ताकि सुधार ना हो सके | 39940 वर्ष 2018 केस मे तो सर्वोच्च न्यायालय के जज अपने ऑफिस का द्रुपयोग करते हुए हमारा मौलिक अधिकारों का हनन कर डालते हैं और झूँठ लिखते हैं “Having heard the learned councel for parties “.

प्रिन्ट मीडिया और एलेक्ट्रॉनिक मीडिया से मिली जानकारी को यदि सच माने तो मुख्तार अंसारी के नाम जारी 26 वॉरन्ट भी नाकाम रहे | उक्त 39940 / 2018 केस मे मूल केस पुणे मे 12 जून 2018 को दर्ज किया गया और 9 मई 2019 को सर्वोच्च न्यायालय ने भोपाल transfer कर 6 माह मे फैसला सुनाने को कहा जबकि 34 माह पूर्व दर्ज यह केस 23 माह से भोपाल कोर्ट मे आर.सी.एस. 1378/19 वहीं का वहीं खड़ा है | आपसे किसी कार्यवाही की अपेक्षा नहीं है | आपका घिसा पिटा जवाब भी मैं जानता हूँ लेकिन मेरे एक आईएएस मित्र ने कहा था कि वर्षों से धूल खा रही फाइल की धूल उस दिन साफ हो जाती है जिस दिन कोई उस फाइल का प्रेमी फाइल माँगता है, अपना काम करते रहो |

न्यायालय की समस्त प्रक्रिया एक मज़ाक है जिसमे जज कुछ देर के लिए न्यायालय में बैठते हैं वह भी कभी कभी | 24x7 बिजली पानी, फोन इंटरनेट, पेट्रोल डीज़ल, अस्पताल दवाएं और एम्बुलेंस, रेस्टोरेंट होटल, रेल हवाई जहाज, बस टैक्सी, ट्रांसपोर्ट, पुलिस सेना और प्रशासन की सारी सुविधाएं भोगने वाला न्यायालय बच्चों के स्कूल की तरह हर छोटे मोटे त्योहार, गर्मियों और जाड़े की छुट्टियों का आनंद नहीं छोड़ पा रहा है और ना ही अन्य 24x7 काम करने वालों विभागों से शिफ्ट वर्किंग के बारे मे कोई सबक ले पा रहा है | इससे भी क्या बात बनने वाली है जब डिजिटल दुनियाँ मे आए दिन वकीलों की हड़ताल, जजों की बिना बताए अवकाश और किसी दिन बैठे भी तो दो मिनट मे प्रतिपक्ष द्वारा application पर जवाब के लिए तारीख, petitioner का जवाब के लिए तारीख और फिर उस पर बहस के लिए अगली तारीख, उसके बाद ऐप्लकैशन पर जज के फैसले के लिए तारीख | इसी प्रक्रिया से गुज़रती एक और appliacation, फिर एक और appliacation, फिर एक और, फिर एक और ...... | फिर जज का transfer | अनंत काल तक ना खत्म होने वाला यह सिलसिला |

सर्वोच्च न्यायालय को सबसे ज्यादा फ़िक्र है तो आतंकवादियों और प्रदर्शनकारियों की | कश्मीरी पंडितों की नृशंस हत्या, बलात्कार, अपने देश मे शरणार्थियों का जीवन बिताने वालों की चिंता नहीं और नाही सड़क पर चलने वालों के मौलिक अधिकार की, नाही रेल और ट्रांसपोर्ट इस्तेमाल करने वालों की, नाही संपत्ति के नुकसान की | Encounter पर प्रसन्नता ज़ाहिर करने वाला समाज आखिर करे तो क्या करे |

बिना किसी जवाब देही के मौज लेता न्यायालय | बिना कुछ result oriented कार्य किए तनख्वा और सुविधाएं लेते जज | दूसरों को सीख देता न्यायालय | भाषा और संस्कृति की मर्यादा तोड़ते मौखिक टिप्पणी करता न्यायालय | केस diary no. 32601 of 2018  page 56 point 50 मे सर्वोच्च न्यायालय द्वारा quote A son is a son until he gets wife. A daughter is a daughter throughout her life. “ क्या यह समस्त पुरुष समाज और बेटों का अपमान नहीं है जो अपना पुत्र धर्म पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ निभा रहे हैं ? क्या यह समस्त महिलाओं का अपमान नहीं है जो अपना पुत्रवधू का धर्म पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ निभा रही हैं ? क्या यह उन बेटियों का अपमान नहीं जो ससुराल में बहु बनकर अपना धर्म पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ निभा रहीं हैं ? शायद इसे quote करने वाले जज साहब और Savita Samvedi (Ms) किसी अपराध बोध से ग्रसित रहते यह टिप्पणी कर बैठे क्योंकि मैं समाज के 99% बेटों, बेटियों और बहुओं को अपना धर्म पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ निभाते देखता हूँ | समाज मे अपवाद तो होते ही हैं | उन्हे यदि कोई अपराध बोध था तो स्वयं पर टिप्पणी करने से उन्हे किसने रोका था ? हिन्दु संस्कृति और भारतीय सभ्यता का ज्ञान ना होने के कारण और पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित जज अजीब ओ गरीब टिप्पणी और फैसले देते समय यह भूल जाते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी और फैसले ना सिर्फ देश में बल्कि देश के बाहर भी उदहारण बनते हैं |

एलेक्ट्रॉनिक और प्रिन्ट मीडिया मे व्याप्त न्यायालयों का भय न्यायालय को आनंद देता है और सोशल मीडिया की टिप्पणी आपको भयभीत करती हैं जबकि हमारी सनातन परंपरा सदैव ही वाद विवाद को भगवान और भक्त के बीच भी अच्छा विकल्प मानती है | भागवत गीता इसका श्रेष्ठ उदाहरण है |

भवदीय

सुबोध कुमार अग्रवाल                                                                     

प्रतिलिपि: 1- माननीय राष्ट्रपति                                  2- माननीय उपराष्ट्रपति

                   3- माननीय प्रधानमंत्री                     4- माननीय कानून और न्याय मंत्री

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