पढ़ी लिखी और दूसरी ऐसी महिलायें जो दबी कुचली नहीं हैं वह अपने महिला होने का वास्ता देकर समाज की सहानुभूति अर्जित करना चाहती हैं और यही वह महिलायें हैं जो पुरुषों के सिर पर तबला बजा रही हैं | दबी कुचली महिलायें तो बेचारी आज भी अपनी दुर्दशा पर रो रही हैं | यही वह महिलायें हैं जो महिला संगठन के नाम पर प्रदर्शन कर रही हैं जबकि जो दर्द समझ रही हैं वह तो चुपचाप अंदर ही अंदर अपना कार्य कर दबी कुचली महिलाओं को शक्ति प्रदान कर रही हैं | वह मुखर भी नहीं हैं | सहानुभूति की अपील भी नहीं करती हैं | यदि सच कहूँ तो इन मुखर होती महिलाओं को इसमें शामिल कर मुस्लिम तुष्टिकरण की तरह महिला तुष्टिकरण का एक खेल खेला जा रहा है | अब समय आ गया है कि हिन्दू - मुस्लिम, महिला - पुरुष से हटकर सिर्फ आर्थिक आधार पर नहीं बल्कि सामाजिक आधार पर भी समाज को दो भागों में बटा देखने की आवश्यकता है, एक सभ्रांत और दूसरा दबे कुचले परिवार | इसके लिए रेवड़ियाँ बाटने वाले रेजिस्ट्रेशन की आवश्यक्ता नहीं |
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