मैं हैरान होता
हूँ जब सुनता हूँ कि न्यायालयों में इन्साफ होता है | न्यायालय में सत्य की जीत होती है | सत्य एक होता है और समय के साथ अपरवर्तनीय है | यदि ऐसा है तो कैसे निचली अदालत से उच्चतम न्यायालय तक पहुँचते पहुँचते
फैसले उलट पुलट हो जाते हैं ? सभी कहते हैं सत्य की जीत हुई है | यह सत्य कैसे समय के साथ परिवर्तित हो जाता है ? सभी अपनी बुद्धि और विवेक के आधार पर न्यायिक फ़ैसला देते हैं ऐसा कहा जाता है | क्या यह सच है कि
न्यायालय में दिए गए फैसलों में व्यक्तिगत निष्ठा प्रतिबद्धता पूर्वाग्रह का स्थान
नहीं होता ? यदि हाँ तो फिर बैंचों के गठन के समय हिंदू
मुस्लिम ईसाई का होना अथवा अलग अलग जाति समुदायों के जजों को बैंच में शामिल करने
का क्या औचित्य है ?
क्या न्यायिक व्यवस्था को
किसी व्यक्ति या समूह का बंधक बनाकर रखा जा सकता है जो स्वयं इसी समाज की विकृति
का हिस्सा है जहां अहिंसा धर्म सम्भाव वैचारिकता
के साथ साथ हिंसा भ्रष्टाचार अधर्म भी निवास करता है | ऐसा विचार काल्पनिक नहीं है बल्कि उस
वास्तविकता पर आधारित है जो हमें आपातकाल से आज तक अनेकों बार देखने को मिला | मनमाने फैसलों को मानने को यह समाज मजबूर है | अब पाठक को यह सवाल दागने
का अधिकार है कि मुझसे पूंछे कि क्या किया जाए ? कहाँ से और कैसे ऐसे व्यक्तियों का चयन हो तो कर्त्तव्य निष्ठा प्रतिबद्धता से
कार्य करें और जो मुंशी प्रेमचंद के पंच परमेश्वर का एक पात्र हो ?
मेरा उत्तर दो
वाक्य का है | पहला : हम स्वीकार करें कि बीमारी है तभी
बीमारी इलाज हो सकता है |
दूसरा:
न्यायालयों और न्यायधीशों को भगवान ऊपर का दर्जा ना दिया जाए | उनके हर कृत और फैसले पर सवाल उठाए जाएं | उनके कार्यों और फैसलों की समीक्षा का समाज को अधिकार हो और
RTI एक्ट उन पर भी लागू किया जाए | उनकी जवाब देही तय हो |
जिस देश में राम
कृष्ण को सुबह पूजा की जाती हो और शाम को समीक्षा की जाती हो उस देश में
न्यायाधीशों को भगवान से ऊपर का दर्जा देना समझ से परे है और यही अन्याय की जड़ है | समूचे राष्ट्र के प्रतिनिधियों द्वारा बनाये कानून को अपने
व्यक्तिगत हित के लिए निरस्त करना, एक व्यक्ति या 3-11 व्यक्तियों के समूह को किसी कानून के प्रावधान पर पुनः विचार
करने का आग्रह करना तो शायद न्यायसंगत हो भी सकता है लेकिन करोड़ों लोगों द्वारा
चुने प्रतिनिधियों द्वारा सर्व सम्मति अथवा बहुमत के आधार पर बनाए कानून को निरस्त
कर देना बहुत चिंता का विषय
है | न्यायाधीशों में सर्व सहमति भी कभी कभी ही दिखाई
देती है | इसीलिये कहना है कि किसी एक व्यक्ति अथवा समूह
के सोच से समस्त समाज को बंधक बनाना उचित नहीं |
No comments:
Post a Comment