ज़्यादातर कानून महिलाओं की ओर
झुकाव के साथ बनाए गए हैं यह मानते हुए कि महिलाओं के साथ ज्यादती होती है, अन्याय
होता है, ज़ुल्म होता है | यह बात बगैर बहस के स्वीकार कर भी ली जाये तो फिर जो बचे
हुए कुछ यानि 1-2 प्रतिशत पुरुष भी हो सकते हैं जिनके साथ महिलायें ज्यादती, ज़ुल्म
और अन्याय करतीं हैं | इस ज्यादती, ज़ुल्म की वजह से कई पुरुष आत्म ह्त्या भी कर लेते
हैं, महिलायों के खिलाफ इक्का दुक्का केस भी दर्ज हुए हैं | सालों साल इन गलत और
थोथे कानून की वजह से पुरुषों ने मानसिक पीढ़ा सही | दहेज़ और क्रूरता जैसे कानूनों
से महिलायों ने न सिर्फ परिवार के सदस्यों को डराकर रखा बल्कि मनमानी की | क्या
पूरा का पूरा कानून इस भावना के विपरीत नहीं है कि 100 गुनाह छूट जाएँ लेकिन एक
बेगुनाह को सजा ना हो | क्या कानून ने सच में महिलायों को सुरक्षा दी है या फिर घर
बर्बाद करने का कवच ?
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